मानव सेवा ही ईश्वर पूजा: 84 की उम्र में भी भवानीमंडी के ‘मसीहा’ बने हुए हैं डॉ. जे.के. अरोड़ा



भवानीमंडी। ( जगदीश पोरवाल )
“व्यक्तित्व यूं ही नहीं बनता, इसके लिए पूरा जीवन खपाना पड़ता है।” चिकित्सा क्षेत्र जैसे संवेदनशील और कठिन पेशे में यह बात शत-प्रतिशत सटीक बैठती है। एक सच्चा चिकित्सक वही है, जिसे नींद में भी मरीजों की पीड़ा और उनके इलाज के नए रास्ते नजर आएं। आज के भौतिकवादी दौर में जहाँ चिकित्सा सेवा कई जगह व्यापार बनती दिखती है, वहीं भवानीमंडी नगर में एक ऐसी महान शख्सियत मौजूद है, जिनके लिए मरीज आज भी ईश्वर का रूप है—डॉ. जगदीश चंद्र अरोड़ा (डॉ. जे.के. अरोड़ा)

20 जुलाई 2026 को डॉ. जे.के. अरोड़ा ने अपने जीवन के सफल एवं सार्थक 84 वर्ष पूरे कर लिए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर जहाँ लोग विश्राम चुनते हैं, वहीं डॉ. अरोड़ा का जज्बा आज भी युवाओं को मात देता है। उनके जीवन के इस विशाल सफर का अर्धशतक (50 से अधिक वर्ष) केवल भवानीमंडी की जनता की सेवा में बीता है।

विभाजन का दर्द और सेवा का संकल्प

अविभाजित भारत (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मे डॉ. अरोड़ा ने जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन सेवा के पथ से कभी विचलित नहीं हुए। भवानीमंडी और आसपास के ग्रामीण अंचलों के लोगों के दिलो-दिमाग में उनके प्रति अगाध श्रद्धा और सम्मान है। दूर-दराज के गांवों से आने वाले मरीजों के लिए डॉ. साहब का व्यवहार ही ‘आधा इलाज’ बन जाता है। मरीज उनसे बात करते ही आधी बीमारी भूल जाता है।

सच्चा और अच्छा इलाज: निस्वार्थ सेवा की मिसाल

आज के दौर में जहाँ महंगे अस्पतालों की परामर्श फीस ही आम आदमी की जेब पर भारी पड़ती है, वहीं डॉ. अरोड़ा साहब मरीजों से कोई फीस नहीं लेते हैं। उनके यहाँ गरीब-अमीर, छोटा-बड़ा का कोई भेद नहीं है। बिना किसी व्यावसायिक स्वार्थ के केवल मानव सेवा और पीड़ित की निस्वार्थ भाव से देखभाल करना ही उनका एकमात्र धर्म है।

दानवीर भामाशाह और नगर के अभिभावक

चिकित्सा सेवा के साथ-साथ डॉ. अरोड़ा नगर की हर सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधि के संवाहक रहे हैं। दान देने के मामले में वे एक ऐसे भामाशाह हैं, जिनके सामने बड़े-बड़े धनपति भी नतमस्तक हो जाएं। उनके दर से आज तक कोई जरूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटा। वे गर्व और अपनत्व से कहते हैं—“यह संपूर्ण भवानीमंडी शहर ही मेरा परिवार है।”

84 की उम्र में भी रात 10 बजे तक सेवा

उम्र के इस ढलते पड़ाव में भी डॉ. अरोड़ा की दिनचर्या अचंभित करने वाली है। वे प्रतिदिन नियमित रूप से मरीजों को देखते हैं और रात 10 बजे तक अपने चिकित्सालय में डटकर मरीजों की सेवा में समर्पित रहते हैं।
भवानीमंडी की समस्त जनता ईश्वर से यही प्रार्थना करती है कि डॉ. जे.के. अरोड़ा साहब दीर्घायु (शतायु) हों, वे सदैव स्वस्थ रहें और इसी प्रकार अपने वात्सल्य एवं चिकित्सीय अनुभव से क्षेत्रवासियों को संबल प्रदान करते रहें।

“खुदा के बंदों से मोहब्बत का हुनर रखते हैं,
भवानीमंडी के दिलों में वो अपना घर रखते हैं।
उम्र का हर साल केवल एक नंबर है ‘अरोड़ा साहब’ के लिए,
वो आज भी हर मरीज पर मसीहा सा असर रखते हैं।”




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