जगदीश पोरवाल
राज्य सरकार द्वारा तबादलों पर से प्रतिबंध हटाते ही प्रदेश में “तबादला महोत्सव” का त्योहार आधिकारिक रूप से शुरू हो चुका है। मौसम वैज्ञानिकों (यानी राजनीतिक विश्लेषकों) का कहना है कि अगले एक महीने तक प्रदेश में ‘सिफारिशों की मूसलाधार बारिश’ होगी, जिससे मंत्रियों और विधायकों के बंगलों पर जलभराव (भीड़) की स्थिति बनी रहेगी।
सरकारी दफ्तरों में सन्नाटा पसरा है, क्योंकि सारे काम छोड़कर बाबू, साहब और चपरासी—सभी इस समय ‘बायोडाटा’ चमकाने और सही ‘कनेक्शन’ खोजने के राष्ट्रीय कर्तव्य में व्यस्त हैं।
नेताओं को आई ‘असली फीलिंग’
प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक के ताजा व्यंग्य ने इस माहौल की नस पकड़ ली है। एक दौर था जब नेताजी चुनाव में जनता के सामने हाथ जोड़कर घूमते थे और पैरों में गिर जाते थे। आज पासा पलट चुका है। जनता (विशेषकर सरकारी कर्मचारी) नेताजी के पैरों में साष्टांग दंडवत कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट है कि सत्ता का असली सुख विकास कार्यों, सड़कों और पुलों के उद्घाटन में नहीं है। असली सुख तो उस लाल पेन में है, जिससे ट्रांसफर की सूची पर ‘टिक’ लगाया जाता है।
“चुनाव जीतने के बाद पांच साल में सिर्फ यही वो महीना नेताओ की जेब गर्म करने का होता है, जब सचमुच लगता है नेतागिरी करना फायदे का सौदा है । वरना बाकी के दिन तो जनता पानी और सड़क के लिए कॉलर पकड़ने आ जाती है।”
छोटे नेताओं की ‘राजनीतिक दुकानें’ गुलजार
इस उत्सव में केवल बड़े मंत्रियों की ही चांदी नहीं है, बल्कि ‘गली-मोहल्ला छाप’ छोटे नेताओं की भी लॉटरी लग गई है। जिनके पास खुद के घर का राशन कार्ड बनवाने की पावर नहीं है, वे भी मंत्रियों के साथ खिंचवाई पुरानी सेल्फी दिखाकर कर्मचारियों को “अरे! आप चिंता मत करो, सीधे क्रीम पोस्टिंग करवाएंगे” का झुनझुना थमा रहे हैं। चाय की टपरियों से लेकर आलीशान होटलों तक, हर जगह बस एक ही चर्चा है—”तुम्हारा जुगाड़ कहाँ तक है?”
प्रशासनिक आवश्यकता या ‘चुनावी निवेश’ की वसूली?
सरकार हर साल की तरह इस बार भी इसे “प्रशासनिक आवश्यकता और जनहित” का नाम दे रही है। लेकिन जनता और खुद कर्मचारी भी जानते हैं कि यह दरअसल ‘चुनावी निवेश’ की वसूली का सबसे मुफीद सीजन है। चुनाव में जो ‘तेल’ बहाया गया था, उसे रीफिल करने का वक्त आ गया है। तबादलों की इस आंधी में सिफारिशों के भाव सोने की तरह बढ़ गए हैं।
व्यंग्य का कड़वा सच
बहरहाल, आम जनता दूर बैठकर इस तमाशे का लुत्फ ले रही है। कार्टूनिस्ट अशोक का व्यंग्य इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि हमारे लोकतंत्र में ‘तबादला उद्योग’ ही एकमात्र ऐसा उद्योग है, जिसमें मंदी कभी नहीं आती।
अब देखना यह है कि इस ‘महोत्सव’ की पूर्णाहुति के बाद कितने अधिकारियों को ‘मलाई’ मिलती है और कितनों के हिस्से सिर्फ ‘मट्ठा’ आता है!

