संजोग का अनोखा चक्र: जिस तारीख को आई थी डोली, 44 साल बाद ठीक उसी दिन उठी अर्थी

​ढोढर (रतलाम)।
कहते हैं जोड़ियां आसमान में बनती हैं, लेकिन विदाई का समय भी नियति पहले से तय कर देती है। रतलाम के ढोढर ग्राम में एक ऐसा ही हृदयस्पर्शी और मार्मिक संयोग सामने आया, जिसे सुनकर हर आंख नम हो गई और हर दिल भर आया।
​ठीक 44 साल पहले जिस तारीख को एक बेटी दुल्हन बनकर ससुराल की देहरी पर कदम रखती है, ठीक उसी तारीख को उसकी अंतिम विदाई होती है। जीवन का यह शाश्वत सत्य ललिता देवी फरक्या के रूप में एक अद्भुत और भावुक संयोग बन गया।

​तारीख वही, बस विदाई का रूप बदल गया

​उज्जैन निवासी चांदमल जी धनोतिया की बेटी ललिता देवी का विवाह 27 जून 1982 को ढोढर निवासी जगदीश चंद्र फरक्या के साथ हुआ था। शादी के बाद इसी तारीख को उन्होंने अपनी ससुराल में पहली बार कदम रखा था।
​ठीक 44 साल बाद, 27 जून 2026 को उनकी शादी की सालगिरह के दिन ही उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई।

​”जिस देहरी पर 44 साल पहले शहनाइयों की गूंज के बीच घूंघट ओढ़े दुल्हन के कदम पड़े थे, उसी देहरी से सालगिरह के दिन अश्रुपूरित आंखों के साथ उनकी अर्थी विदा हुई।”

परिवार का एक बेहद भावुक निर्णय

​पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहीं ललिता देवी ने 26 जून को अंतिम सांस ली। इसके बाद परिवार ने एक ऐसा फैसला लिया जो उनके अगाध प्रेम और सम्मान को दर्शाता है।

​पति जगदीश चंद्र और बेटे किमतेश ने बताया कि चूंकि ललिता देवी का गृह-प्रवेश 27 जून को हुआ था, इसलिए परिवार ने तय किया कि उन्हें अंतिम विदाई भी इसी पावन तारीख को दी जाएगी। इस भावनात्मक निर्णय ने श्मशान घाट पर मौजूद हर शख्स को रोने पर मजबूर कर दिया।

​छोड़ गईं यादों का भरा-पूरा संसार

​स्वर्गीय ललिता देवी अपने पीछे पति, पुत्र किमतेश, पुत्री निक्की और एक हंसता-खेलता भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। उनके जाने से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर है, लेकिन इस अनोखे संयोग की चर्चा हर जुबान पर है।

​जीवन का अंतिम सत्य

​यह घटना हमें याद दिलाती है कि यह संसार एक चक्र की तरह है। जिस घर को एक बेटी अपनी खुशियों और त्याग से सींचकर ‘ससुराल’ से ‘अपना घर’ बनाती है, अंततः उसी घर से उसकी अंतिम विदाई भी होती है। ललिता देवी की यह अंतिम यात्रा मानो जीवन के इसी अटल और शाश्वत सत्य का संदेश दे गई।
​पुण्यात्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि।

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