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भवानीमंडी। ( जगदीश पोरवाल ) श्री राधेश्याम मंदिर दुकान बिक्री मामले में चल रहा विवाद अब और गहरा गया है। मंदिर ट्रस्ट के भीतर मचे घमासान के बीच रविवार रात को एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जब ट्रस्ट के 9 ट्रस्टियों में से एक ट्रस्टी गोविंद गुप्ता (पुत्र लालचंद गुप्ता) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उन्होंने अपना त्यागपत्र देवस्थान विभाग, कोटा को भेज दिया है।
क्यों दिया इस्तीफा? अंदरूनी राजनीति से थे आहत
मिली जानकारी के अनुसार, त्यागपत्र देने वाले ट्रस्टी गोविंद गुप्ता ट्रस्ट के भीतर बार-बार बदलते घटनाक्रम और दबाव की राजनीति से आहत थे।
घटनाक्रम
“रविवार को दिन में जब ट्रस्ट के अध्यक्ष के.के. राठी को पद से हटाने के लिए एक पत्र सौंपा गया था, उस पर गोविंद गुप्ता सहित चार अन्य ट्रस्टों के हस्ताक्षर थे । लेकिन रात में अचानक घटनाक्रम ने करवट बदली। उसी दिन रात को ही राठी जी ही अध्यक्ष पद पर बने रहेंगे का पत्र जारी हुआ उस पत्र में उन ट्रस्टीयो में से तीन ट्रस्टियो के नाम दर्ज थे और हस्ताक्षर थे जिन्होंने दिन में राठी जी को अध्यक्ष पद से मुक्त करने वाले पत्र में हस्ताक्षर किए थे प्राप्त जानकारी अनुसार इस दोहरे रवैये और बार-बार बदलते स्टैंड से असहमत थे। इसी मानसिक उधेड़बुन से बाहर निकलने के लिए उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफा देना ही बेहतर समझा होगा ।”
क्या कहता है नियम: सीधे इस्तीफा भेजना मान्य नहीं
ट्रस्ट से जुड़े मामलों में कोई भी इस्तीफा सीधे तौर पर प्रभावी नहीं होता है। इसके लिए एक निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य है:
धारा 23 और फॉर्म-8 (प्रपत्र-8): राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1959 की धारा 23 के तहत, यदि ट्रस्ट के रजिस्टर में दर्ज विवरणों (जैसे ट्रस्टी का हटना, नियुक्ति, मृत्यु या इस्तीफा) में कोई बदलाव होता है, तो इसकी सूचना विभाग को देना जरूरी है। इसके लिए फॉर्म-8 भरकर देवस्थान आयुक्त या सहायक आयुक्त को रिपोर्ट सौंपी जाती है।
अभिलेखों में बदलाव: इस कानूनी प्रक्रिया के पूरे होने के बाद ही ट्रस्ट के सरकारी रिकॉर्ड में बदलाव दर्ज किया जाता है।
अधिकारी का बयान: अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही हटेगा नाम
कोटा देवस्थान विभाग के सहायक आयुक्त के.के. खंडेलवाल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:
“प्रन्यास (ट्रस्ट) से संबंधित किसी भी प्रकरण का निस्तारण अर्ध-न्यायिक कार्रवाई के तहत किया जाता है। किसी भी ट्रस्टी द्वारा सीधे इस्तीफा भेजना कोई विधिवत कार्रवाई नहीं है। यदि किसी सदस्य का विधिवत आवेदन प्राप्त होता है, तो सबसे पहले प्रकरण दर्ज किया जाता है। इसके बाद फॉर्म-8 भरवाकर मामले पर बकायदा सुनवाई की जाती है। पूरी कानूनी प्रक्रिया संपन्न होने के पश्चात ही रिकॉर्ड से उस नाम को विधिवत रूप से डिलीट (हटाया) किया जाता है।”
फिलहाल, गोविंद गुप्ता के इस कदम के बाद राधेश्याम मंदिर ट्रस्ट की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है और अब देखना यह होगा कि देवस्थान विभाग इस इस्तीफे पर आगे क्या रुख अपनाता है।

