राज्य के सरकारी अस्पतालो का ‘सिस्टम’ आईसीयू में: अस्पतालों को हुआ भ्रष्टाचार का ‘इन्फेक्शन’!

​जगदीश पोरवाल ( व्यंग्य बाण )

​अगर आप सोच रहे हैं कि सरकारी अस्पताल सिर्फ मरीजों के इलाज के लिए होते हैं, तो अपनी सामान्य ज्ञान की किताब तुरंत अपडेट कर लीजिए। राजस्थान के सरकारी अस्पताल इन दिनों एक नए और अनोखे ‘अनुसंधान’ में जुटे हैं—”बिना इलाज किए बजट को कैसे हजम किया जाए!” हाल ही में मशहूर कार्टूनिस्ट अशोक के एक स्केच ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। कार्टून में साफ दिख रहा है कि संक्रमण (इन्फेक्शन) अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर में नहीं, बल्कि सीधे सरकारी ‘सिस्टम’ की धमनियों में बह रहा है। पहले कोटा, फिर बीकानेर और अब जोधपुर… प्रदेश के बड़े-बड़े शहरों के अस्पताल एक-दूसरे से मुकाबला कर रहे हैं कि कौन सा अस्पताल मरीजों को ज्यादा डराने में कामयाब रहता है। ताजा मामला जोधपुर का है, जहाँ सिजेरियन डिलीवरी के बाद 8 महिलाओं की तबीयत बिगड़ने पर ऑपरेशन थिएटर (OT) को ही ताला लगाना पड़ गया।

​बजट का ‘ग्लूकोज’ और भ्रष्टाचार का ‘बैक्टीरिया’

​सरकार हर साल अस्पतालों को चमकाने के लिए भारी-भरकम बजट आवंटित करती है। जनता सोचती है कि इस बजट से नई मशीनें और दवाइयाँ आएँगी, लेकिन हकीकत यह है कि यह बजट अस्पताल पहुँचने से पहले ही भ्रष्टाचार के ‘बैक्टीरिया’ का शिकार हो जाता है। नतीजा? करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी अस्पताल खुद वेंटिलेटर पर नजर आते हैं। जनता इन्हें ‘अस्पताल’ कहती जरूर है, लेकिन यहाँ जाना किसी एडवेंचर स्पोर्ट्स से कम नहीं है—बच गए तो गनीमत!

​सरकारी ‘जमाई’ और दौरों का ‘टॉनिक’

​अस्पतालों की इस दुर्दशा के पीछे एक और खास वजह है। हमारे कुछ सरकारी डॉक्टर खुद को भगवान से कम और सरकार का ‘नकद जमाई’ ज्यादा समझते हैं। मजाल है कि कोई उनके आराम में खलल डाल दे!
ऐसा नहीं की सभी डॉक्टर ऐसे हो कुछ मेहनतकश, ईमानदार और नौकरी के प्रति वफादार होते हैं जो मरीजों की जान बचाने के लिए अपनी जान तक लगा देते हैं । जिन्हें मरीज और उनके परिजन जिंदगी भर याद रखते हैं ।

​विचित्र बात यह है कि जब भी कोई बड़ा हादसा होता है, हमारे माननीय नेता और उच्च प्रशासनिक अधिकारी लाव-लश्कर के साथ ‘अस्पताल दर्शन’ के लिए निकल पड़ते हैं। दौरों पर दौरे होते हैं, कैमरों के सामने गंभीर चेहरे बनाए जाते हैं, और कड़े निर्देश वाले ‘टॉनिक’ बांटे जाते हैं। लेकिन जैसे ही वीआईपी गाड़ियों का काफिला वापस मुड़ता है, अस्पताल की व्यवस्था फिर से उसी ‘कोमा’ में चली जाती है जहाँ वह पहले थी।

जनता पूछ रही है कि जब पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था ही ‘संक्रमित’ हो चुकी है, तो डॉक्टर साहब पहले किसका इलाज करेंगे—मरीज का या इस सड़ चुके सिस्टम का?

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