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जगदीश पोरवाल (व्यंगात्मक टिप्पणी)
राजस्थान में इन दिनों लोकतंत्र का एक अनोखा और ‘थ्रिलर’ वर्जन देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार और हाई कोर्ट के बीच ‘तारीख पे तारीख’ का ऐसा मैच चल रहा है, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे स्क्रिप्ट राइटर भी शर्मा जाए जाएं। हाई कोर्ट ने साफ़-साफ़ अल्टीमेटम दे दिया है—”31 जुलाई तक हर हाल में पंचायत और नगर निकाय चुनाव कराइए!” लेकिन सरकार का मिजाज कुछ ऐसा है कि “हम बोलेंगे भी नहीं और समय पर करेंगे भी नहीं!”
तैयारी चुनाव की या कानों में रुई डालने की?
कार्टूनिस्ट अशोक ने चुनाव आयोग के दफ्तर के भीतर चल रहे असली ‘कंफ्यूजन’ को बखूबी उजागर किया है। चुनाव आयोग के अधिकारी और कर्मचारी इस बात को लेकर भारी तनाव में हैं कि आखिर वो किस चीज का टेंडर जारी करें?
चुनाव के लिए मतपेटियों और वोटर लिस्ट की छपाई का?
या फिर 31 जुलाई के बाद हाई कोर्ट से मिलने वाली ‘स्पेशल वीआईपी फटकार’ को झेलने के लिए कानों में रुई और दर्द निवारक बाम का?
सूत्रों की मानें तो: चुनाव आयोग पूरी तरह तैयार खड़ा है, लेकिन सरकार ने चुनाव की तारीख को किसी ‘सीक्रेट लॉकर’ में बंद कर रखा है, जिसकी चाबी शायद खुद मुख्यमंत्री भी ढूंढ रहे हैं।
‘शिविर’ से फुर्सत मिले तो लोकतंत्र याद आए!
सरकार का टाइम-मैनेजमेंट तो इतना लाजवाब है कि इस पर मैनेजमेंट गुरुओं को रिसर्च करनी चाहिए। 12 जून से 15 जुलाई तक पूरे प्रदेश में ‘ग्रामीण और शहरी सेवा शिविर’ लगाए जा रहे हैं। जनता की सेवा में सरकार इतनी मग्न है कि उसे यह याद ही नहीं रहा कि इसके ठीक 15 दिन बाद हाई कोर्ट की डेडलाइन खत्म हो रही है।
गणित बड़ा सीधा है:
15 जुलाई: सेवा शिविरों का समापन (जनता की सेवा पूरी)।
31 जुलाई: हाई कोर्ट की आख़िरी तारीख (अ।
बीच के 15 दिन: इतने कम समय में तो कोई शादी का कार्ड न बांटे, सरकार चुनाव कैसे करा दे?
ऐसे में यह साफ़ है कि सरकार चुनाव कराने की तैयारी तो पूरी शिद्दत से कर रही है, लेकिन बस ‘तारीख’ घोषित करना भूल जा रही है।
जनता की अदालत बनाम हाई कोर्ट क
अब देखना दिलचस्प होगा कि 31 जुलाई को राजस्थान की जनता को वोटिंग मशीन का बटन दबाने का मौका मिलता है या फिर सरकार के नुमाइंदों को हाई कोर्ट के सामने जाकर ‘सॉरी सर, अगली बार पक्का’ कहने का एक और मौका मिलता है।
फिलहाल, सचिवालय के गलियारों में यही गाना गूंज रहा है—”तारीख तुम चुन लो, फटकार हम झेल लेंगे!”

