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जगदीश पोरवाल ( जनसंदेश )
जैसे ही आसमान में बादल घिरते हैं, आम जनता के दिलों की धड़कनें बढ़ जाती हैं और नगर निगम / पालिका के अधिकारियों को ‘प्री-मानसून मेंटेनेंस’ के नाम पर किए गए कागजी दावों की याद आने लगती है। लेकिन इस बार कुदरत थोड़ी मेहरबान दिखी। मानसून ने आते ही एक छोटा सा ‘ब्रेक’ क्या ले लिया, हमारे नगर निगम और बिजली विभाग के अधिकारियों ने राहत की ऐसी सांस ली है कि शहर का वायु प्रदूषण ही कम हो जाए!
जाने-माने कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने ताजा कार्टून में इसी कड़वे सच पर तीखा तंज कसा है। कार्टून में एक आम नागरिक परेशान होकर पूछ रहा है— “यार यह मानसून बार-बार ब्रेक क्यों दे देता है?” जिस पर दूसरा जागरूक नागरिक अखबार (जिस पर लिखा है: कई नालों की सफाई बाकी) थामे जवाब देता है— “ताकि जिम्मेदार अफसरों को सद्बुद्धि आ जाए और वे बचे-खुचे नालों की सफाई करवा लें!”
नगर निगम का अनूठा ‘वाटर मैनेजमेंट’
हर साल की तरह इस साल भी मानसून आने से पहले दावों के बड़े-बड़े ‘बांध’ बांधे गए थे। घोषणाएं थीं कि सारे नाले चकाचक साफ हो चुके हैं। लेकिन जैसे ही पहली फुहार पड़ी, नालों ने अपनी ‘औकात’ और निगम ने अपनी ‘मजबूती’ दिखा दी। गंदा पानी सड़कों पर हिलोरें मारता ।
अब जब मानसून ने जरा सा ब्रेक लिया है, तो नगर निगम के ठेकेदार और अफसर भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे हैं। उनके लिए यह ब्रेक कोई प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि परीक्षा से ठीक पहले मिला ‘ग्रेस पीरियड’ है। देखना यह है कि इस ब्रेक में वाकई नालों का कचरा साफ होता है या सिर्फ कागजों पर सफाई का बिल पास होता है।
बिजली विभाग की ‘अंधेरी’ सेटिंग
इस बहती गंगा (या कहें बहते नाले) में हाथ धोने से बिजली विभाग कैसे पीछे रह सकता है? विभाग का ‘प्री-मानसून मेंटेनेंस’ तो एक ऐसा रहस्य है जिसे आज तक कोई सुलझा नहीं पाया। चिलचिलाती धूप में हफ्तों तक बिजली काटकर जो ‘रखरखाव’ किया जाता है, उसकी पोल बारिश की पहली बूंद गिरते ही खुल जाती है।
हवा का एक हल्का सा झोंका और पानी की दो बूंदें गिरते ही ट्रांसफार्मर ऐसे ठप होते हैं जैसे उन्होंने ‘वर्क फ्रॉम होम’ से भी मना कर दिया हो। बिजली विभाग के इंजीनियर भी अब बादलों की तरफ देखकर यही दुआ कर रहे हैं कि “हे मेघराज! जरा थमे रहो, अभी हमारी रील्स… सॉरी, मेंटेनेंस का काम पूरा नहीं हुआ है।”
मानसून का यह ब्रेक आम जनता के लिए गर्मी और उमस की आफत लेकर आया है, लेकिन नगर पालिका व बिजली विभागों के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है। अब देखना यह है कि अगली जोरदार बारिश में शहर डूबता है या सचमुच अफसरों की ‘सद्बुद्धि’ जागती है!

