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जगदीश पोरवाल
लोकतंत्र में आंदोलन तो बहुत देखे होंगे, जहां एक तरफ जनता अपनी मांगों के लिए चिल्लाती है और दूसरी तरफ पुलिस लाठी-डंडा तानकर ‘शांति व्यवस्था’ बहाल करती है। लेकिन जयपुर के कलेक्ट्रेट के बाहर कुछ ऐसा हुआ, जिसने खाकी महकमे के भीतर एक अनोखा ‘इमोशनल क्राइसिस’ (भावनात्मक संकट) खड़ा कर दिया है।
मामला यह है कि सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक द्वारा चित्तौड़गढ़ के डूंगला थाने में पुलिसकर्मियों के साथ कथित तौर पर ‘अशोभनीय भाषा’ और अभद्र व्यवहार क्या हुआ, रिटायर्ड पुलिसकर्मियों का खून खौल उठा। उन्होंने कलेक्ट्रेट पर धावा बोल दिया, नारेबाज़ी की और राज्यपाल व मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर मंत्री जी को पद से हटाने की मांग कर डाली।
भीतर से ‘सहानुभूति’, बाहर से ‘ड्यूटी’
कार्टूनिस्ट अशोक की पैनी नजर ने इस आंदोलन के सबसे मजेदार और बारीक पहलू को पकड़ा है। ऑन-ड्यूटी खड़ा एक पुलिसकर्मी मुस्कुराते हुए सोच रहा है:
”यह पहला आंदोलन होगा जिसे कंट्रोल करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है जो भीतर से आंदोलन के पक्ष में हैं।”
बात में दम भी है! अब कलेक्ट्रेट के बाहर सुरक्षा में तैनात वर्तमान पुलिसकर्मी करें तो क्या करें? सामने जो बुजुर्ग और पूर्व अधिकारी ‘मंत्री जी हाय-हाय’ के नारे लगा रहे हैं, वे कोई साधारण आंदोलनकारी नहीं हैं। वे उनके ही पूर्व सीनियर, उस्ताद और महकमे के दादा-परदादा हैं। दिल कह रहा है कि ‘सर, सही कह रहे हो, मंत्री जी ने भाषा तो गलत इस्तेमाल की ही थी!’ लेकिन सरकारी आदेश और हाथ में थमी लाठी कह रही है, ‘चुपचाप अनुशासन में खड़े रहो।’
यह तो वही बात हो गई कि घर के बड़े-बुजुर्ग बाहर समाज में लड़ाई लड़ रहे हों और बच्चों को उन्हें रोकने की ड्यूटी सौंप दी जाए!
’बिना संगठन’ के भी ‘एकजुट’ होने का डर
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे संगठन के प्रदेशाध्यक्ष रिछपाल सिंह पूनिया ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि भले ही वर्तमान में नौकरी कर रहे पुलिसकर्मियों का कोई संगठन नहीं है और वे खुलकर नहीं बोल सकते, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खाकी का अपमान सह लिया जाएगा। पूर्व पुलिसकर्मी अब एकजुट होकर इसे राज्यव्यापी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं।
आमतौर पर जब कोई आंदोलन होता है, तो पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच ‘छत्तीस का आंकड़ा’ होता है। लेकिन इस अनोखे प्रदर्शन ने एक नया इतिहास रच दिया है—जहां ‘कंट्रोल’ करने वाले भी मन ही मन ‘कंट्रोल से बाहर’ होने वालों की बातों पर मुस्कुराते हुए सहमति जता रहे हैं। अब देखना यह है कि ऑन-ड्यूटी खाकी की इस मूक सहानुभूति और ऑफ-ड्यूटी खाकी के इस मुखर गुस्से के बीच मंत्री जी की कुर्सी की ‘सहकारिता’ कब तक बची रहती है!

