जगदीश पोरवाल
कहते हैं कि कलयुग में हर चीज़ की कीमत तय है, लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था ने तो अब ‘पुण्य और सम्मान’ का भी बकायदा एमआरपी (MRP) तय कर दिया है। आज के दो ताज़ा घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया है कि एक तरफ जहाँ ज्ञान के मंदिर में ‘कैश काउंटर’ खुल गए हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीति के अखाड़े में ‘पुरानी याददाश्त’ को ताक पर रखकर पत्थरबाजी का नया दौर शुरू हो गया है।
पहला प्रहार: दान दो, सम्मान लो… सोर्स मत पूछो!
राजस्थान शिक्षा विभाग ने अपनी ‘दिव्य’ और ‘असाधारण’ बुद्धि का परिचय देते हुए शिक्षा में एक नया ‘क्लास सिस्टम’ लागू किया है। अब आपका सम्मान इस बात से तय नहीं होगा कि शिक्षा के प्रति आपका भाव कितना पवित्र है, बल्कि इस बात से तय होगा कि आपकी जेब कितनी भारी है। सीधे शब्दों में कहें तो—”जितना बड़ा माल, उतना बड़ा सम्मान।”
कार्टूनिस्ट अशोक ने इसी विडंबना पर गहरा तंज कसा है, जहाँ कौवे भी मुंडेर पर बैठकर बतिया रहे हैं कि ‘सम्मान अब मिलता नहीं, खरीदा जाता है।’ विभाग के इस नए नवाचार से ऐसा लगता है मानो शिक्षा संकुल के बाहर एक बड़ा बोर्ड लगा दिया गया है: “दान दो, सम्मान लो… कैश काउंटर दाईं तरफ है।”
बड़ा सवाल:
अब विभाग को इस बात से कतई फर्क नहीं पड़ता कि दान में आने वाली लक्ष्मी सफेद है, काली है, या तस्करी के रास्तों से होकर आई है। नतीजा यह होगा कि अपनी ईमानदारी की गाढ़ी कमाई से छोटा-मोटा दान देने वाला ‘असली भामाशाह’ कौने में खड़ा हाथ मलता रह जाएगा, और दो नंबर की कमाई को ठिकाने लगाने वाले ‘नवेले दानवीर’ राज्य स्तरीय ताज पहनकर शहर के सबसे बड़े ‘भामाशाह’ कहलाएंगे। वाह रे शिक्षा विभाग!
दूसरा प्रहार: जिनके खुद के घर शीशे के हों…
दूसरा दिलचस्प नजारा राजनीति के रंगमंच पर देखने को मिल रहा है। नीट (NEET) परीक्षा के मौजूदा घटनाक्रम को लेकर प्रदेश कांग्रेस आज भाजपा मुख्यालय का घेराव करने ‘जयपुर कूच’ कर रही है। छात्र हितों की यह चिंता देखकर आंखों में आंसू आना स्वाभाविक है, लेकिन जनता की याददाश्त इतनी भी कमजोर नहीं है।
कार्टूनिस्ट अशोक ने विपक्ष के इस जोश पर ऐसा ‘आईना’ दे मारा है कि चेहरा छुपाना भारी पड़ रहा है। कार्टून साफ बयां करता है कि जब खुद का राज था, तब 2018 से 2023 के बीच परीक्षाओं के पेपर ऐसे लीक हो रहे थे मानो सरकारी दफ्तर से समोसे की प्लेटें बंट रही हों।
तंज का तीर:
दो-दो बार पेपर लीक का ‘कीर्तिमान’ बनाने वाले सूरमा जब आज नैतिकता का झंडा उठाकर सड़कों पर उतर रहे हैं, तो पृष्ठभूमि से एक ही आवाज गूंज रही है—”शीशे के घरों में रहने वालों को दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।”
जनता सब देख रही है
कुल मिलाकर, आज की तस्वीर साफ है। एक तरफ शिक्षा विभाग झोली फैलाकर ‘रकम’ के हिसाब से सम्मान की हैसियत तय करने में मसरूफ है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक दल अपनी पुरानी ‘लीक’ फाइलों को दबाकर दूसरों के आँगन में कमियाँ ढूंढ रहे हैं। राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था का यह ‘जुगलबंदी’ वाला सर्कस जनता बड़े चाव से देख रही है!

