खाली जेब का नया फैशन: जेबमुक्त भारत की ओर कदम!

जगदीश पोरवाल

​कहते हैं कि इंसान की जरूरतें कभी खत्म नहीं होतीं, लेकिन आज के दौर में सरकार और महंगाई ने मिलकर इंसान की सबसे बड़ी जरूरत यानी ‘जेब’ के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है। कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने कार्टून में आम आदमी की इसी दुखती रग पर हाथ रखा है, जहां एक परेशान पति अपनी पत्नी से कह रहा है— “सोच रहा हूं कपड़ों में जेब रखना ही बंद कर दूं…” यह सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि 8.3% की रफ्तार से भाग रही थोक महंगाई के गाल पर एक करारा तमाचा है। आइए इस ‘जेबमुक्त’ दर्शनशास्त्र के कुछ दिलचस्प पहलुओं को समझते हैं:

​1. जेब: एक ऐतिहासिक और अनावश्यक वस्तु

​अखबार की सुर्खियां चीख-चीख कर कह रही हैं कि थोक महंगाई एक ही महीने में दोगुनी होकर 42 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। ईंधन की महंगाई 24 गुना बढ़ चुकी है। ऐसे में जब जेब में रखने के लिए पैसे ही नहीं बचेंगे, तो कपड़ों में वो फालतू का चार इंच का कपड़ा (जेब) सिलवाकर दर्जी को एक्स्ट्रा पैसे क्यों दिए जाएं? यह तो सीधे-सीधे वेस्टेज ऑफ रिसोर्स है!

​2. ‘पॉकेटमारी’ के धंधे पर सर्जिकल स्ट्राइक

​इस नए फैशन का सबसे बड़ा फायदा देश के कानून-व्यवस्था को होगा। जब जनता के कपड़ों में जेब ही नहीं होगी, तो बेचारे जेबकतरे (पॉकेटमार) क्या मारेंगे? वे तो बेरोजगारी के मारे खुद कोई दूसरा ईमानदार धंधा ढूंढने पर मजबूर हो जाएंगे। महंगाई ने आम आदमी को लूटा, तो आम आदमी ने जेब हटाकर चोरों का ही बिजनेस मॉडल ध्वस्त कर दिया। इसे कहते हैं ‘मास्टरस्ट्रोक’!

​3. बजट का नया गणित

​अखबार की कटिंग में विशेषज्ञों का दावा है कि कंपनियों की इनपुट कॉस्ट बढ़ रही है, इसलिए वे दाम बढ़ाएंगी। आम आदमी ने भी अपनी ‘इनपुट कॉस्ट’ (कमाई) और ‘आउटपुट’ (खर्च) का नया गणित लगा लिया है। जब पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम आसमान छू रहे हों, तो आम आदमी के पास सिर्फ दो ही विकल्प बचते हैं: या तो वह रोए, या फिर अपने कुर्ते और पैंट से जेबें उखाड़ फेंके ताकि कम से कम ‘जेब खाली होने’ का मानसिक तनाव तो न रहे।

​ना रहेगी जेब, ना रोएगा आम आदमी

कार्टूनिस्ट का यह व्यंग्य दिखाता है कि आज का ‘आम आदमी’ वह दिव्य प्राणी बन चुका है, जो भूखा रह सकता है, फटेहाल रह सकता है, लेकिन अपने सेंस ऑफ ह्यूमर को मरने नहीं देता। सरकार भले ही महंगाई कम न कर पाए, लेकिन जनता ने महंगाई से बचने का शॉर्टकट ढूंढ लिया है— ना रहेगी जेब, ना रोएगा आम आदमी!

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