मासूम गौरी की विदाई का गम, प्रशासन की संवेदनशीलता ने पोंछे परिजनों के आंसू

झालावाड़। ( जगदीश पोरवाल ) जब नियति निष्ठुर हो जाए, तो मानवीय संवेदनाएं ही एकमात्र संबल बनती हैं। झालावाड़ में 8 मई की वो काली तारीख, जिसने नन्ही गौरी के खिलखिलाते बचपन को आवारा कुत्तों के हमले में छीन लिया, पूरे जिले को झकझोर गई। लेकिन इस हृदयविदारक घटना के बाद जिला प्रशासन ने न केवल दुख जताया, बल्कि एक ‘अभिभावक’ की भूमिका निभाते हुए पीड़ित परिवार का हाथ थामा है।

नियमों की बेड़ियों से ऊपर उठी इंसानियत

​आमतौर पर सरकारी सहायता की फाइलें कागजों और नियमों में उलझकर रह जाती हैं, लेकिन इस मामले में जिला कलक्टर की संवेदनशीलता ने मिसाल पेश की है। भंवरगढ़ (बारां) की मूल निवासी और हाल झालरापाटन में रह रही मृतका गौरी के परिवार को न्याय दिलाने के लिए प्रशासन ने ‘नियमों में शिथिलता’ देने की प्रभावी पैरवी की।

प्रशासन की सक्रियता: एक झलक

  • त्वरित कार्रवाई: घटना के तुरंत बाद जिला कलक्टर के निर्देश पर समस्त आवश्यक दस्तावेज तैयार कर राज्य सरकार को भेजे गए।
  • भावनात्मक जुड़ाव: राजस्व विभाग की टीम केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने पीड़ित परिजनों के घर जाकर उनका बैंक खाता खुलवाया, ताकि सहायता राशि सीधे उन तक पहुंच सके।
  • मुख्यमंत्री की ओर से संबल: शासन स्तर पर की गई इस मर्मस्पर्शी पैरवी का ही परिणाम है कि मुख्यमंत्री कार्यालय ने नियमों को लचीला बनाते हुए मुख्यमंत्री सहायता कोष से आर्थिक मदद स्वीकृत की है।

“एक मासूम की जान की कीमत किसी भी राशि से नहीं आंकी जा सकती, लेकिन प्रशासन का यह प्रयास उस परिवार को यह अहसास दिलाता है कि इस दुख की घड़ी में वे अकेले नहीं हैं।”

झालावाड़ जिला प्रशासन की इस संवेदनशीलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सरकारी तंत्र में मानवीय दृष्टिकोण हो, तो ‘सुशासन’ केवल शब्द नहीं बल्कि पीड़ित के लिए मरहम बन जाता है।


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