फोटोजीवी राजनीति: जब फ्रेम बड़ा हो जाए और कद छोटा!


जगदीश पोरवाल
आज का यह कार्टून और आपकी व्याख्या राजनीति के उस ‘फेविकोल वाले जोड़’ पर करारा प्रहार करती है, जो केवल एक सेल्फी या फोटो के दम पर खड़ा किया जाता है। कार्टूनिस्ट अशोक ने बड़ी चतुराई से उस विडंबना को पकड़ा है जहाँ एक नेता की ‘मुस्कुराहट’ और अपराधी की ‘फ्रेम में मौजूदगी’ के बीच का फासला अक्सर पुलिस की चार्जशीट तय करती है।
इस विषय पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी:

“फोटोजीवी संस्कृति”
राजनीति सेवा से ज्यादा ‘सेल्फी’ का खेल बन गई है। इसे हम “फोटोजीवी संस्कृति” कह सकते हैं। नियम बड़ा सरल है: काम चाहे शून्य हो, पर फोटो ‘फुल’ होनी चाहिए। शहर में किसी बड़े नेता का आना किसी त्योहार से कम नहीं होता, खासकर उन ‘छुटभैया’ नेताओं के लिए जिनका मुख्य व्यवसाय ही धक्का-मुक्की करके फ्रेम में जगह बनाना है।
1. धक्का-मुक्की का ‘डिप्लोमा’
इन स्थानीय नेताओं के पास भीड़ में कोहनी मारने का ऐसा अद्भुत कौशल होता है कि बड़े-बड़े बाउंसर भी मात खा जाएं। इनका एकमात्र लक्ष्य होता है—बड़े नेता के कंधे के पास अपना चेहरा टिका देना। एक बार फोटो खिंच गई, तो समझो राजनीति की ‘वैतरणी’ पार हो गई।
2. सोशल मीडिया का ‘भ्रम जाल’
कैमरे की एक क्लिक और फेसबुक-इंस्टाग्राम पर कैप्शन की बाढ़: “बड़े भाई साहब के साथ अंतरंग चर्चा!” भले ही उस ‘चर्चा’ में बड़े भाई साहब ने सिर्फ इतना ही कहा हो— “अरे भाई, थोड़ा पीछे हटो, सांस लेने दो!” लेकिन जनता को तो यही लगता है कि अगली कैबिनेट मीटिंग इन्हीं के ड्राइंग रूम में होने वाली है।
3. जब फोटो ‘गले की फांस’ बन जाए
नीट पेपर लीक जैसे मामलों में जब ये ‘फोटो प्रेमी’ सलाखों के पीछे पहुँचते हैं, तब असली ‘कॉमेडी’ शुरू होती है। वही बड़े नेता, जो कल तक फोटो में दांत चियारे खड़े थे, अचानक ‘स्मृति लोप’ (Amnesia) के शिकार हो जाते हैं। स्पष्टीकरण आता है— “भीड़ में कोई भी फोटो खिंचवा लेता है, इसका मतलब यह नहीं कि वह हमारा है।” > विडंबना देखिए: फोटो खिंचवाते समय वह ‘परम मित्र’ और ‘निष्ठावान कार्यकर्ता’ होता है, और पकड़े जाने पर वह ‘अज्ञात राहगीर’ बन जाता है।
4. फ्रेम की ताकत
दुकानों और दफ्तरों में टंगे ये भारी-भरकम फ्रेम दरअसल ‘अदृश्य कवच’ का काम करते हैं। जब तक सब ठीक है, ये फ्रेम ‘पावर’ दिखाते हैं, और जब मामला बिगड़ता है, तो यही फ्रेम नेताओं के लिए ‘स्पष्टीकरण’ का नया सिलेबस तैयार करते हैं।

अपराधी के साथ का एक फोटो -पॉलिटिकल करियर’ का पेपर लीक कर सकती है!

यह कार्टून एक कड़वा सच दिखाता है कि आज नेता को जनता से ज्यादा ‘कैमरे’ से डरना चाहिए। क्योंकि जनता तो पांच साल में एक बार हिसाब मांगती है, पर सोशल मीडिया पर वायरल एक पुरानी फोटो किसी भी समय ‘पॉलिटिकल करियर’ का पेपर लीक कर सकती है!

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