राजनीति का ‘लेग-पीस’ अध्याय: जब विकास की जगह होने लगी टांगों की बातें!

जगदीश पोरवाल

​भारतीय राजनीति में रंग बदलने की परंपरा तो पुरानी है, लेकिन अब चर्चा का विषय ‘लात-घूँसों’ से गिरकर ‘टांगों’ तक आ गया है। टोंक की सियासत ने हाल ही में राजनीति को एक नया ‘ऑर्थोपेडिक’ मोड़ दे दिया है।​

भाजपा का ‘एक्स-रे’ विजन

    भाजपा के राजस्थान प्रभारी राधा मोहन दास अग्रवाल ने एक जनसभा में सचिन पायलट के राजनीतिक भविष्य का ‘मेडिकल टेस्ट’ कर डाला। उन्होंने तंज कसा— “पायलट की एक टांग कांग्रेस में है और दूसरी का पता नहीं कहाँ!” यानी उनके अनुसार, पायलट साहब राजनीति में ‘एक पैर’ पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।


    गहलोत का ‘लेग-फिक्सेशन’

    जवाब देने में माहिर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तुरंत’राजनीतिक गोंद’ लगाया और स्पष्ट किया— “अब उनकी दोनों टांगे कांग्रेस में ही हैं और रहेंगी।” गहलोत साहब ने आश्वस्त किया कि अब पायलट साहब कहीं और कदम नहीं बढ़ाएंगे।


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    इस टांग-पुराण’ पर कार्टूनिस्ट अशोक का कार्टून पूरी व्यवस्था पर करारा तमाचा है।

    • चित्र में: एक आम आदमी दोनों हाथों में इन नेताओं के विरोधाभासी बयानों वाले अखबार थामे गुस्से में तमतमा रहा है।

    • संदेश: ऊपर लिखे शब्द जनता की असली पीड़ा बताते हैं— “इंतिहा हो गई! राजनीति में भाषा का स्तर टांगों की खिंचाई तक गिर गया है!”


    कुंवर बेचैन की प्रसिद्ध पंक्तियाँ आज की राजनीति पर एकदम फिट बैठती हैं:

    “यूं तो एक टांग से भी चल लेते हैं लोग, लेकिन दूसरी भी साथ दे तो और बात है।”

    नेताओं के लिए यह ‘टांगों’ का खेल हो सकता है, लेकिन जनता सोच रही है कि देश की ‘विकास वाली टांग’ आखिर कहाँ अटकी है? फिलहाल तो राजनीति में सिर्फ ‘टांग-खिंचाई’ का ही दौर जारी है!


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