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जगदीश पोरवाल
भारतीय जनता पार्टी में पिछले एक दशक से अन्य दलों से आए नेताओं की बढ़ती संख्या को लेकर अंदरूनी असंतोष अब व्यंग्य के माध्यम से खुलकर सामने आने लगा है। इसी क्रम में एक चर्चित कार्टून ने संगठन के भीतर चल रही खींचतान को हल्के-फुल्के लेकिन चुभते अंदाज में उजागर कर दिया है।
कार्टून में एक वरिष्ठ नेता दूसरे से कहते नजर आते हैं— “आपी और कांग्रेसियों इसी तरह पार्टी में आते रहे तो हम जनसंघ के जमाने वाले दरी-पट्टी ही उठाते रहेंगे क्या?” यह संवाद सीधे तौर पर उन पुराने कार्यकर्ताओं की पीड़ा को दर्शाता है, जिन्होंने वर्षों तक संगठन के लिए जमीन पर काम किया, लेकिन आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
व्यंग्य का सार यही है कि पार्टी को भले ही “आयातित” नेताओं से तात्कालिक चुनावी लाभ मिलता हो, लेकिन इससे मूल संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं के मन में असंतोष गहराता जा रहा है। इन कार्यकर्ताओं का मानना है कि जो लोग वर्षों तक “दरी-पट्टी बिछाने” से लेकर संगठन को खड़ा करने में लगे रहे, उन्हें सत्ता आने के बाद अपेक्षित सम्मान और अवसर नहीं मिल पा रहा।
कार्टून के जरिए यह भी संकेत दिया गया है कि नए आने वाले नेता अपने साथ कार्यकर्ताओं की पूरी टीम लेकर आते हैं और उन्हें प्राथमिकता दिलाने में सफल रहते हैं। वहीं, पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता पीछे छूटते जा रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह व्यंग्य केवल एक चित्र नहीं, बल्कि संगठन के भीतर पनप रही उस भावना का प्रतीक है, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य में चुनौती बन सकता है।
अब देखना यह होगा कि शीर्ष नेतृत्व इस “दरी-पट्टी वाले दर्द” को कितनी गंभीरता से लेता है—या फिर यह व्यंग्य भी बाकी आवाजों की तरह भीड़ में कहीं खो जाता है।

