‘लोकतंत्र’ ब
जगदीश पोरवाल
राजस्थान की राजनीति में इन दिनों “लोकतंत्र बचाओ” का नारा काफी ट्रेंड कर रहा है। कांग्रेस पार्टी ने झंडा उठा लिया है कि चुनाव कराओ और लोकतंत्र बचाओ। मांग तो जायज है, क्योंकि बिना चुनाव के लोकतंत्र वैसा ही है जैसे बिना दूल्हे की बारात। लेकिन, जनता के मन में एक टेढ़ा सवाल उठ रहा है—साहब, चुनाव के बाद जो ‘लोकतंत्र’ बचेगा, क्या उसकी कोई गारंटी है?
वोट हमारा, नेता तुम्हारा?
कार्टूनिस्ट अशोक ने अपने व्यंग्य से सीधे उस दुखती रग पर हाथ रखा है जिसे हर आम आदमी महसूस कर रहा है। एक तरफ नेताजी तख्ती पकड़े खड़े हैं कि “चुनाव कराओ,” तो दूसरी तरफ एक आम नागरिक अखबार पढ़ रहा है जिसमें लिखा है—“चुनाव जीतने के बाद कई नेता दल बदल लेते हैं।”
यह आज की राजनीति का नया ‘सर्कस’ है। जनता धूप में लाइन लगाकर वोट डालती है, उंगली पर स्याही लगवाती है, और कुछ ही दिनों बाद पता चलता है कि जिस ‘हाथ’ या ‘कमल’ को उन्होंने चुना था, उसने रातों-रात पाला बदल लिया है। अब इसे ‘अंतरात्मा की आवाज’ कहें या ‘सत्ता की मलाई’, जनता का जनादेश तो बीच चौराहे पर लावारिस खड़ा रह जाता है।
दूध का धुला कौन?
आरोप-प्रत्यारोप का खेल ऐसा है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे पर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हैं। लेकिन जब बात छोटे दलों या निर्दलीय पार्षदों और पंचों को ‘मैनेज’ करने की आती है, तो दोनों ही दलों की ‘मैनेजमेंट स्किल’ देखते ही बनती है। निकाय और पंचायत चुनावों में तो यह खेल और भी निराला है; जिसकी लाठी (सत्ता), उसकी भैंस (जनप्रतिनिधि)।
चुनाव तो झाँकी है, दलबदल अभी बाकी है!
निश्चित रूप से, समय पर चुनाव होना लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है। लेकिन अगर चुनाव के बाद ‘जनादेश’ को ही बाजार में नीलाम कर दिया जाए, तो सवाल उठता है कि हम लोकतंत्र बचा रहे हैं या सिर्फ अपनी-अपनी कुर्सियां?
व्यंग्य बाण: लोकतंत्र की धड़कन सिर्फ मतदान की मशीन (EVM) में नहीं, बल्कि नेताजी की ‘निष्ठा’ में होनी चाहिए। वरना चुनाव तो होते रहेंगे, जीत भी पक्की होगी, बस लोकतंत्र हर बार दलबदल की भेंट चढ़कर “शहीद” होता रहेगा।
सियासी गलियारे से एक ही आवाज आ रही है: “चुनाव कराइए हुजूर, पर कम से कम यह तो बताइए कि चुनाव के बाद आपका नेता उसी पार्टी में मिलेगा या अगली सुबह किसी और का झंडा थामे ‘लोकतंत्र’ को नए सिरे से बचा रहा होगा?”

