“ महिला आरक्षण आया, पर सीटें वही पुरानी सोच की…” — कार्टून में छुपा सियासी तंज


भवानीमंडी/ ( जगदीश पोरवाल )
महिला आरक्षण संशोधन बिल को लेकर देशभर में जहां एक ओर राजनीतिक दल अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, वहीं प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक के एक कार्टून ने इस पूरे मुद्दे पर करारा व्यंग्य किया है। यह कार्टून न सिर्फ कानून की मंशा पर सवाल उठाता है, बल्कि उसके जमीनी क्रियान्वयन पर भी तीखी टिप्पणी करता नजर आता है।

आरक्षण मिल भी गया तो चुनावी टिकट नेताओं की पत्नी या परिवार की महिला को

कार्टून में एक महिला दो नेताओं से सवाल करती दिखाई गई है, जबकि दोनों नेता पसीना-पसीना होते नजर आते हैं। महिला का संवाद— “बुरा मत मानना, हमें आरक्षण मिल भी गया तो चुनावी टिकट नेताओं की पत्नी या उनके घर की महिलाओं को ही मिलेगा” — सीधे तौर पर उस हकीकत की ओर इशारा करता है, जो अक्सर स्थानीय निकाय चुनावों में देखने को मिलती है।

असल सत्ता उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्यों के हाथो में

राजनीति के जानकारों का मानना है कि यह व्यंग्य “प्रॉक्सी राजनीति” पर केंद्रित है, जहां महिलाओं को आरक्षण तो मिलता है, लेकिन असल सत्ता उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्यों के हाथ में ही रहती है। कार्टून में नेता के हाथ में “महिला आरक्षण संशोधन विधेयक” का कागज भी इसी विडंबना को और गहरा करता है।

“ अशोक का कार्टून सच्चाई का आईना”

यह कार्टून सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और आमजन के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। कई लोग इसे “सच्चाई का आईना” बता रहे हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी मान रहे हैं कि सिर्फ कानून बनाने से नहीं, बल्कि सोच बदलने से ही वास्तविक सशक्तिकरण संभव है।

महिला आरक्षण बिल भले ही संसद में पारित होकर ऐतिहासिक कदम माना जा रहा हो, लेकिन अशोक का यह कार्टून यह सवाल छोड़ जाता है—
क्या महिलाओं को सच में अधिकार मिलेंगे, या फिर यह भी सिर्फ नाम का आरक्षण बनकर रह जाएगा?

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