भैसोदामंडी (जगदीश पोरवाल)। सरकारी सिस्टम की कछुआ चाल देखनी हो तो भैसोदामंडी में निर्माणाधीन रेलवे ओवर ब्रिज (ROB) इसका सबसे सटीक उदाहरण है। 22 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह ब्रिज आज जनता की सुविधा के बजाय उनकी परेशानी का सबब बन गया है। 8 साल पहले जिस ब्रिज का सपना स्थानीय जनता को दिखाया गया था, वह आज भी लेबर की कमी और प्रशासनिक ढिलाई के कारण अधूरा खड़ा है।
बंगाल चुनाव का बहाना, 15 दिनों से काम ठप
विगत 15 दिनों से ब्रिज का निर्माण कार्य पूरी तरह बंद पड़ा है। इस संबंध में एडीओ पी.डब्ल्यू.डी. ब्रिज प्रवीण नरवरे का तर्क हैरान करने वाला है। उनके अनुसार, ठेकेदार की लेबर पश्चिम बंगाल की रहने वाली है और वहां चुनाव होने के कारण मजदूर अपने घर चले गए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या इतने बड़े प्रोजेक्ट की समय-सीमा केवल लेबर के भरोसे छोड़ दी गई है? नरवरे ने यह भी साफ किया कि अभी इस ब्रिज को पूरा होने में एक साल से ज्यादा का वक्त और लगेगा।इससे पूर्व भी इस ब्रिज का काम दो-तीन बार बंद हो चुका है ।
ब्रिज निर्माण की ‘दशकीय’ यात्रा
इस ब्रिज का इतिहास काफी लंबा और थका देने वाला रहा है:
पहली घोषणा: वर्तमान गरोठ-भानपुरा विधायक चंद्रसिंह सिसोदिया के पहले कार्यकाल (लगभग 8 वर्ष पूर्व) में हुई थी।
काम की शुरुआत: घोषणा के 6 साल बाद यानी मात्र 2 वर्ष पहले काम शुरू हो पाया।
वर्तमान स्थिति: काम बीच-बीच में रुकता रहा है और अब भी 1 साल की देरी और बताई जा रही है।
निष्कर्ष: अगर अगले साल काम पूरा होता भी है, तो एक ब्रिज को हकीकत बनने में कुल 10 साल का लंबा समय लग जाएगा।
ट्रैफिक जाम की मार झेलती जनता
ब्रिज निर्माण में हो रही देरी का सीधा खामियाजा आम जनता भुगत रही है। रेलवे फाटक बंद होने के कारण रोजाना सैकड़ों वाहनों को लम्बा इंतजार कर कतार में खड़ा रहना पड़ता है। स्कूल बसें, एम्बुलेंस और व्यापारी सभी इस देरी से परेशान हैं।

राजस्थान सीमा से जुड़ाव पर बना संशय
एक ओर जनता को उम्मीद थी कि यह ब्रिज राजस्थान से संपर्क आसान करेगा, वहीं दूसरी ओर विभाग का कहना है कि फिलहाल इसे राजस्थान सीमा से जोड़ने की कोई योजना नहीं है। इस मुद्दे पर स्थानीय भाजपा नेताओं—श्याम गुर्जर, मनोहर सैनी और कमल हटवाल—ने मोर्चा संभाल लिया है।
नेताओं की मांग:
नारायण खेड़ा की तरफ से नया मार्ग बनाया जाए।
ब्रिज को भवानीमंडी एसडीएम ऑफिस के सामने तक जोड़ा जाए। नेताओं का कहना है कि यदि यह ब्रिज राजस्थान के भवानीमंडी से सीधे नहीं जुड़ा, तो भविष्य में यातायात व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी। इसके लिए शासन को पत्राचार भी किया गया है।
प्रशासनिक विफलता या केवल दुर्भाग्य?
जनता अब यह पूछ रही है कि 22 करोड़ का बजट होने के बावजूद इस प्रोजेक्ट को ‘ग्रहण’ क्यों लगा है? क्या 10 साल का समय एक ओवरब्रिज के लिए पर्याप्त नहीं है? फिलहाल, धूल और जाम के बीच भैसोदामंडी के लोग केवल तारीखों के आगे बढ़ने का तमाशा देखने को मजबूर हैं।

