भवानीमंडी । जगदीश पोरवाल
पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल गर्मी के साथ चरम पर पहुंच चुका है। राज्य की राजनीति में इस बार भी मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा नजर आ रहा है। एक दौर में जहां कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा था, वहीं ममता बनर्जी ने उस किले को ढहाकर अपनी मजबूत पकड़ बनाई।
इसी सियासी उठापटक और रणनीतियों पर प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने एक तीखा व्यंग्यात्मक कार्टून तैयार किया है, जो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है।
कार्टून में क्या है खास?
कार्टून में एक “कोचिंग सेंटर” दिखाया गया है, जहां बंगाली भाषा में भाषण देना सिखाया जाता है। वहीं एक नेता दूसरे से कहता नजर आता है कि “क्या तुम्हारी पार्टी भी चुनाव प्रचार के लिए बंगाल भेज रही है”।
यह दृश्य साफ तौर पर इस बात की ओर इशारा करता है कि बाहरी राज्यों के नेताओं को बंगाल की राजनीति में उतारने से पहले उन्हें स्थानीय भाषा और संस्कृति के अनुरूप तैयार किया जा रहा है।
राजनीतिक संदेश
कार्टून के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की गई है कि चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल हर संभव रणनीति अपना रहे हैं—चाहे वह स्थानीय भाषा सीखना हो या क्षेत्रीय मुद्दों के अनुरूप खुद को ढालना।
भारतीय जनता पार्टी पिछले एक दशक से लगातार ममता बनर्जी के मजबूत गढ़ को चुनौती देने में जुटी है, लेकिन अब तक उसे निर्णायक सफलता नहीं मिल पाई है।
व्यंग्य के जरिए सियासत पर प्रहार
कार्टूनिस्ट अशोक का यह व्यंग्य न केवल हंसी पैदा करता है, बल्कि यह भी बताता है कि आज की राजनीति में जमीनी जुड़ाव और स्थानीय समझ कितनी महत्वपूर्ण हो गई है।
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में जहां एक ओर सीधा मुकाबला तेज हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐसे व्यंग्यात्मक कार्टून राजनीतिक दलों की रणनीतियों पर जनता को सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

