भवानीमंडी । ( जगदीश पोरवाल )। बरसों से हम ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘लैंगिक समानता’ (Gender Equality) की बातें कर रहे थे। समाज सुधारक थक गए यह कहते-कहते कि महिलाओं को हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए। लगता है राजस्थान की कुछ महिला अधिकारियों ने इस बात को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया है।
ताज़ा समाचारों के अनुसार, भ्रष्टाचार के जिस ‘कीचड़’ में अब तक केवल ‘खाकी’ और ‘खादी’ वाले पुरुष पहलवान ही कुश्ती लड़ते दिखते थे, अब वहां ‘पिंक कॉलर करप्शन’ की धमक सुनाई दे रही है।
मुख्य बातें: जब ‘रक्षक’ ही बने ‘भक्षक’
कार्टूनिस्ट अशोक ने अपनी कूची से इसी विडंबना पर प्रहार किया है। कार्टून में एक महिला बड़े गर्व से कह रही है— “हाँ, अब तो महिलाएँ भी मुख्यधारा से जुड़ रही हैं।” विडंबना देखिए कि यहाँ ‘मुख्यधारा’ का मतलब देश सेवा नहीं, बल्कि ‘जेब सेवा’ बन गया है।
- समानता का अनूठा उदाहरण: पिछले एक साल में एक दर्जन से अधिक महिला अधिकारियों का रिश्वत के मामलों में फंसना यह बताता है कि भ्रष्टाचार के मामले में अब कोई भेदभाव नहीं रह गया है।
- रेट कार्ड भी भारी-भरकम: खबर के मुताबिक, रिश्वत की राशि हजारों से शुरू होकर 2 करोड़ रुपये तक जा रही है। यानी ‘टारगेट’ और ‘महत्वाकांक्षा’ के मामले में महिलाएँ पुरुषों से बिल्कुल पीछे नहीं हैं।
- शपथ गई तेल लेने: जनसेवा की शपथ लेकर कुर्सी पर बैठने वाली इन अधिकारियों ने साबित कर दिया है कि ‘सशक्तिकरण’ का असली मतलब शायद अपनी तिजोरियाँ सशक्त करना ही समझ लिया गया है।
डिजिटल दौर में ‘स्मार्ट’ करप्शन
भले ही एसीबी (ACB) अब व्हाट्सएप कॉल और डिजिटल रिकॉर्डिंग से घेराबंदी कर रही है, लेकिन भ्रष्टाचार की यह ‘पिंक एक्सप्रेस’ रुकने का नाम नहीं ले रही।
व्यंग्य का तीर: > समाज तो चाहता था कि महिलाएँ हर क्षेत्र में नाम रोशन करें, पर यहाँ तो उन्होंने भ्रष्टाचार के ‘अंधेरे’ को ही रोशन करना शुरू कर दिया है। इसे आप ‘प्रगति’ कहेंगे या ‘पतन’, यह फैसला अब जनता को करना है।
नकार्टूनिस्ट अशोक का यह कार्टून समाज के उस कड़वे सच को उजागर करता है जहाँ नैतिकता का जेंडर से कोई लेना-देना नहीं रहा। भ्रष्टाचार अब एक ‘न्यूट्रल’ खेल बन चुका है, जिसमें खिलाड़ी चाहे पुरुष हो या महिला, गोल हमेशा जनता की मेहनत की कमाई पर ही होता है।

