भवानीमंडी । (जगदीश पोरवाल)
शिक्षा विभाग की ‘ऐतिहासिक पहल’ के जवाब में आम आदमी ने भी अपनी ‘ऐतिहासिक चीख’ दर्ज करा दी है। प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक के ताजा कार्टून ने विभाग के 2950 नामों वाली ‘दिव्य सूची’ पर सीधा सवाल दाग दिया है। इन नाम में छात्रों के 1409 नाम तथा छात्रों के 1541 नाम की सूची है ।शिक्षा मंत्री मदन दिलावर कहते हैं कि व्यक्ति का नाम व्यक्तित्व ,संस्कार और सामाजिक छवि का दर्पण होता है ।
कार्टून में क्या है?
कार्टून में एक गुस्साया हुआ आम नागरिक दोनों हाथों में अखबार लहराते हुए चिल्ला रहा है। उसके स्पीच बबल में लाल अक्षरों में लिखा है: “माननीय! नाम नहीं व्यवस्था बदलना ज्यादा जरूरी हैं”।
उसके हाथों में जो अखबार हैं, वे विभाग के ‘नामकरण अभियान’ की पोल खोल रहे हैं:
- बाएं हाथ का अखबार: “शिक्षकों की कमी”, “गिरता पढ़ाई का स्तर”, “खंडहर होते स्कूल” • दाएं हाथ का अखबार: “शिक्षकों पर गैर शैक्षणिक कार्य का बोझ”, “स्कूल में संसाधनों की कमी”
यानी जब स्कूल की छत गिर रही हो, मास्टर साहब जनगणना में व्यस्त हों, और बच्चे टाट-पट्टी के लिए तरस रहे हों, तब विभाग ‘घसीटालाल’ को ‘गोपाल’ बनाने में व्यस्त है।
शिक्षकों को निर्देश दिए गए
शिक्षा विभाग की कितनी हास्यादपद बात है कि .उन्होंने छात्र -छात्रोंओ का नाम परिवर्तन करने के लिए मुहिम चलाने के लिए कहा है,संवेदनशीलता के साथ उन बच्चों की पहचान करें जिनके नाम अर्थहीनहै साथ ही अभिभावकों को जागरूक करें नाम परिवर्तन करने के लिए ।
उन्होंने आगे जोड़ा, “रही बात शिक्षकों की कमी की, तो देखिए, ‘डलचंद’ नाम वाले टीचर पढ़ाने में डल हो जाते हैं। हम उनका नाम ‘कर्मवीर’ कर देंगे। नाम सुनते ही जोश आ जाएगा, सैलरी की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।”
‘व्यवस्था’ नाम का शब्द डिक्शनरी से गायब
लगता है विभाग ने अपनी डिक्शनरी में से ‘व्यवस्था’, ‘शिक्षक’, ‘संसाधन’ जैसे ‘अटपटे’ शब्द हटाकर ‘नाम’, ‘सूची’, ‘समारोह’ जैसे ‘सार्थक’ शब्द जोड़ लिए हैं।
कार्टूनिस्ट अशोक ने टिप्पणी से इनकार करते हुए सिर्फ इतना कहा, “मैं तो सिर्फ वही बना रहा हूँ जो दिख रहा है। बाकी ‘सार्थक’ व्याख्या के लिए विभाग अधिकृत है।”
यह समाचार कार्टून में दिखाए गए गुस्से से प्रेरित है। यदि किसी की भावना आहत हो तो अपना नाम बदलकर ‘सहनशील’ रख लें, कष्ट कम होगा।

