डिजिटल इंडिया’ की अर्थी पर सवार 16 हजार पन्नों का ‘न्याय’ व्यंगात्मक रिपोर्ट

जगदीश पोरवाल (भवानीमंडी )

देश में ‘पेपरलेस इंडिया’ का नारा अभी हवा में गूँज ही रहा था कि भ्रष्टाचार के एक ताजे मामले ने इसकी धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने अदालत में जो ‘नजराना’ पेश किया है, उसे देखकर पर्यावरण प्रेमी और तकनीक के पैरोकार, दोनों ही सदमे में हैं।

भ्रष्टाचार बड़ा, तो कचरा भी बड़ा!

कहते हैं जितना बड़ा अधिकारी, उतना बड़ा कमीशन। लेकिन यहाँ तो कहानी ही अलग है। घोटाले की परतें खोलने के लिए ACB ने 16 हजार पन्नों की पहली चार्जशीट दाखिल की है। इतना ही नहीं, इसकी ‘फोटोकॉपी’ का आंकड़ा तो सवा तीन लाख तक पहुँच गया है। स्थिति यह थी कि इन कागजों को ढोने के लिए कोई ब्रीफकेस या अलमारी नहीं, बल्कि पूरी की पूरी दो बसें बुक करनी पड़ीं।

पेड़ों का ‘कत्ल’ और न्याय की ‘प्यास’

मशहूर कार्टूनिस्ट अशोक ने अपनी कूची से इसी कड़वी सच्चाई पर नमक छिड़का है। उन्होंने दिखाया है कि कैसे सरकार एक तरफ ‘पेड़ लगाओ अभियान’ का विज्ञापन छपवाती है और दूसरी तरफ उसी विभाग के कारनामों को सिद्ध करने के लिए हज़ारों पेड़ों की बलि चढ़ाकर कागज रंगे जाते हैं।
कार्टून में रोते हुए पेड़ पूछ रहे हैं— “उफ़! हम बचेंगे कैसे?” और दूसरा पेड़ जवाब देता है— “यह चार्जशीट नहीं, वन विभाग वालों के लिए चेतावनी है।” शायद पेड़ों को अब इंसानी कुल्हाड़ी से ज्यादा कानूनी कागजों की भूख से डर लगने लगा है।

व्यंग्य के मुख्य बिंदु:

प्रशासनिक विरोधाभास: एक ओर ई-गवर्नेंस की बातें, दूसरी ओर ट्रकों और बसों में भरकर आती चार्जशीटें।
पर्यावरण का ‘एनकाउंटर’: भ्रष्टाचार की जांच में जितने गुनहगार पकड़े जाएंगे या नहीं, उससे पहले हज़ारों पेड़ों का ‘पेपर मर्डर’ निश्चित रूप से हो चुका है।
अजीब विडंबना: जिस ‘जल जीवन मिशन’ का काम लोगों की प्यास बुझाना था, उसी के घोटाले ने कागजों के ढेर से पर्यावरण का दम घोंट दिया है।

भारी भरकम ट्रेन की जरूरत पड़ेगी ?

अगर न्याय की गति यही रही और कागजों का अंबार यूँ ही बढ़ता रहा, तो आने वाले समय में अदालतों को जज और वकीलों के साथ-साथ एक ‘लॉजिस्टिक मैनेजर’ और भारी-भरकम ‘क्रेन’ की भी ज़रूरत पड़ेगी। ‘डिजिटल इंडिया’ फिलहाल तो दो बसों के नीचे दबा हुआ कराह रहा है।

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