जगदीश पोरवाल ( भवानीमंडी )
आज का विश्व जिस मोड़ पर खड़ा है, वह प्रगति की पराकाष्ठा नहीं बल्कि विनाश की पूर्व संध्या प्रतीत होती है। एक ओर हम अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने के सपने देख रहे हैं, तो दूसरी ओर पूरी मानवता बारूद के उस ढेर पर बैठी है जिसकी चिंगारी कभी भी बड़े राष्ट्रों के अहंकार से सुलग सकती है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य को देखकर यह सवाल पूछना लाजिमी हो गया है कि क्या हम वास्तव में ‘आधुनिक’ हो रहे हैं या फिर अपनी ही तकनीकी और सामरिक उपलब्धियों के बोझ तले दबकर वापस ‘पाषाण युग’ की ओर लौट रहे हैं?
1. महाशक्तियों की ‘हथियार मंडी’ और पिसते छोटे राष्ट्र
विश्व पटल पर आज अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों ने एक ऐसी त्रिकोणीय ‘दादागिरी’ स्थापित कर ली है, जहाँ विकास से ज्यादा विनाश के सामान की नुमाइश होती है। इन महाशक्तियों ने दुनिया को गुटों में बांट दिया है। कई छोटे देश अपनी संप्रभुता खो चुके हैं; वे या तो इन महाशक्तियों के टुकड़ों पर पल रहे हैं या उनके सैन्य संरक्षण के बदले अपनी स्वायत्तता गिरवी रख चुके हैं।
इन ‘आका’ देशों की रणनीति स्पष्ट है—छोटे देशों के बीच विवाद सुलझाना नहीं, बल्कि उन्हें उलझाए रखना ताकि उनकी हथियारों की दुकानदारी चलती रहे। मिसाइलें, पनडुब्बियां और गोला-बारूद बेचने के लिए शांति को बलि वेदी पर चढ़ाया जा रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष से शुरू हुआ यह सिलसिला अब वेनेजुएला और मिडिल ईस्ट तक फैल चुका है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर जारी बमबारी ने वैश्विक स्थिरता को हिला कर रख दिया है।
2. ऊर्जा संकट: चूल्हे और धुएं की ओर वापसी के संकेत
पाषाण युग की ओर वापसी का सबसे पहला व्यावहारिक संकेत ‘ऊर्जा संकट’ के रूप में दिखाई दे रहा है। खाड़ी देशों में युद्ध के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति ठप होने की कगार पर है। जब पेट्रोलियम पदार्थों की आवक रुकती है, तो आधुनिक परिवहन और रसद की पूरी व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।
हांलकि भारत ने ऊर्जा संकट पर बहुत कुछ स्थिति संभाल रखी है लेकिन फिर भी यदि युद्ध लंबा चला तो आगे स्थिति कुछ भी हो सकती है । ग्रामीण क्षेत्रों में संभावित ऊर्जा संकट को देखते हुए इसका प्रत्यक्ष असर अब ग्रामीण अंचलों में दिखने लगा है। एलपीजी गैस की किल्लत और आपूर्ति बाधित होने के कारण लोग वापस लकड़ी और कंडों (उपलों) से खाना बनाने की शुरुआत कर चुके हैं। जो धुआं दशकों पहले रसोई से विदा हो गया था, वह मजबूरी बनकर फिर लौट आया है। यह केवल ईंधन का बदलाव नहीं, बल्कि जीवन स्तर के सदियों पीछे जाने का प्रतीक है।
3. डिजिटल ब्लैकआउट: सभ्यता का अंधकार
यदि युद्ध की विभीषिका इसी तरह बढ़ती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब समुद्र के भीतर बिछी ‘ऑप्टिकल फाइबर केबल’ युद्ध का निशाना बनेंगी। आज की पूरी दुनिया इंटरनेट और डेटा पर टिकी है। जिस दिन ये केबल काट दी जाएंगी, उस दिन आधुनिक सभ्यता का ‘स्मार्ट’ मुखौटा उतर जाएगा।
बिना इंटरनेट, बिना बिजली और बिना संचार के इंसान अचानक खुद को उसी आदिम स्थिति में पाएगा जहाँ सूचना का आदान-प्रदान असंभव था। तकनीक का यह ‘ब्लैकआउट’ ही वह बिंदु होगा जहाँ से आदमी औपचारिक रूप से आधुनिक युग को विदाई देकर नए दौर के पाषाण युग में प्रवेश कर जाएगा।
निष्कर्ष
युद्ध कभी समाधान नहीं होता, वह केवल अवशेष छोड़ता है। यदि विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों ने अपनी निजी स्वार्थ की राजनीति और हथियारों का व्यापार बंद नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियां महलों में नहीं, बल्कि खंडहरों में रहने को मजबूर होंगी। पाषाण युग से आधुनिक युग तक आने में मानवता को लाखों वर्ष लगे, लेकिन वापस जाने के लिए बस एक ‘गलत फैसले’ की देर है।
नोट- चित्र ए आई द्वारा निर्मित काल्पनिक है ।

