ग्वालियर रियासतकालीन धरोहर को मिला नवजीवन: जल गंगा संवर्धन अभियान से निखरी भैसोदा की प्राचीन बावड़ी

भैसोदा (मंदसौर) ( जगदीश पोरवाल )| मंदसौर जिले के भैसोदा नगर पंचायत क्षेत्र में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और जल स्रोतों के पुनर्जीवन की एक नई इबारत लिखी गई है। ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के अंतर्गत शनिवार को किए गए जीर्णोद्धार कार्यों से वर्षों से उपेक्षित पड़ी एक प्राचीन बावड़ी का कायाकल्प हो गया है। ग्वालियर रियासत काल की यह महत्वपूर्ण जल संरचना अब एक बार फिर अपनी पुरानी चमक बिखेर रही है।

गंदगी के ढेर से स्वच्छता की मिसाल तक

​भैसोदा की मुख्य सड़क पर स्थित यह ऐतिहासिक बावड़ी देखरेख के अभाव में अपना अस्तित्व खो रही थी। समय के साथ यह घास-फूस, कटीली झाड़ियों और कचरे से पट गई थी। दूषित पानी और उपेक्षा के कारण स्थानीय लोगों ने इसका उपयोग बंद कर दिया था। कभी क्षेत्र की प्यास बुझाने वाली यह बावड़ी केवल एक खंडहर बनकर रह गई थी।

अभियान ने बदली तस्वीर

​जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत इस बावड़ी को प्राथमिकता सूची में शामिल किया गया। सामूहिक प्रयासों के जरिए:

  • ​बावड़ी के भीतर जमा वर्षों पुराने कचरे और सिल्ट को साफ किया गया।
  • ​आसपास उगी झाड़ियों को हटाकर क्षेत्र को व्यवस्थित किया गया।
  • ​जल स्रोतों को पुनर्जीवित कर पानी को स्वच्छ बनाया गया।
  • ​परिसर का सौंदर्यीकरण कर इसे सुरक्षित स्वरूप दिया गया।

विरासत के संरक्षण का संकल्प

​नगर पंचायत अध्यक्ष गायत्री अजय पौराणिक ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा:

​”यह बावड़ी अब केवल जल संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। इस अभियान की सफलता के बाद अब भैसोदा में स्थित दूसरी बावड़ी की भी साफ-सफाई और जीर्णोद्धार जल्द ही किया जाएगा।”

जन-जागरूकता की लहर

​इस कायाकल्प ने स्थानीय नागरिकों में भी उत्साह भर दिया है। लोग अब इस अमूल्य धरोहर को स्वच्छ रखने और इसके संरक्षण के लिए स्वयं आगे आ रहे हैं। भैसोदा की यह सफलता कहानी यह सिद्ध करती है कि सामूहिक इच्छाशक्ति से हम अपनी मिटती विरासत को न केवल बचा सकते हैं, बल्कि उसे भविष्य की पीढ़ियों के लिए उपयोगी भी बना सकते हैं।

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