कैलाश जैन एडवोकेट
( भवानीमंडी )
हर वर्ष की तरह इस बार भी रंग, गुलाल और उमंग का यह पर्व हमारे जीवन में नई ऊर्जा भरने को तैयार है। लेकिन अक्सर यह सुनने को मिलता है—“अब त्योहारों में पहले जैसी बात नहीं रही।” सच भी है… समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, तो परंपराएं और जीवन मूल्य भी बदलते हैं।
जब बचपन की यादों का एल्बम खोलता हूं तो होली की अनेक रंगीन, मादक और मनोरंजक तस्वीरें मुस्कुराती हुई सामने आ खड़ी होती हैं। होली के दस-पंद्रह दिन पहले से ही मोहल्लों में हलचल शुरू हो जाती थी। बच्चे और युवा मिलकर होलिका दहन की तैयारी में जुट जाते—घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा करना, राहगीरों को रोककर हंसी-मजाक में सहयोग मांगना, यह सब अपने आप में एक उत्सव होता था।
कभी-कभी शरारती युवा किसी के आंगन में रखी पुरानी बेंच या लकड़ी की वस्तु उठा लाते। हालांकि आज पर्यावरण की दृष्टि से हरे पेड़ों को काटना अनुचित माना जाता है, लेकिन उस दौर में इसे होली की शरारती तैयारी का हिस्सा समझा जाता था। अंततः पूर्णिमा की रात, अग्नि की लपटों के साथ बुराई के दहन और अच्छाई की विजय का संदेश पूरे नगर में गूंज उठता था।
गैर की परंपरा: सामूहिक उल्लास का प्रतीक
धुलेंडी की सुबह से ही रंगबाजी आरंभ हो जाती। अबीर-गुलाल से सजी गलियां, ढोल की थाप और “बुरा न मानो होली है” की पुकार—हर मन को रंग देती थी। उस समय गैर निकालने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित थी। नागरिक एक बड़े समूह के रूप में नगर भ्रमण करते, एक-दूसरे को गुलाल लगाते, गले मिलते और हंसी-ठिठोली करते।
कई बार गीतों में चुटीलापन और खुलापन भी होता, जो सामान्य दिनों में स्वीकार्य नहीं होता, परंतु उस दिन सब कुछ होली की मस्ती में क्षम्य समझा जाता था।
यह परंपरा पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुई, पर इसकी व्यापकता और भव्यता कम अवश्य हुई। ऐसे समय में भवानीमंडी के राधेश्याम मंदिर ट्रस्ट के क्रिएटिव अध्यक्ष के.के. राठी ने पिछले दो वर्षों में गैर की इस प्राचीन परंपरा को न केवल पुनर्जीवित किया, बल्कि उसे भव्य, विराट और शालीन स्वरूप प्रदान किया। रंगों और मधुर संगीत से सजी यह गैर आज भी नगरवासियों की स्मृतियों में जीवंत है। जानकारी के अनुसार इस वर्ष भी ट्रस्ट के तत्वावधान में आकर्षक होली गैर प्रस्तावित है—जो निश्चय ही परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम सिद्ध होगी।
प्रभात फेरी: भक्ति और उल्लास का संगम
नित्य संकीर्तन प्रभात फेरी परिवार द्वारा संचालित होली की प्रभात फेरी एक अलग ही आत्मीयता का अनुभव कराती है। भजन, कीर्तन और रंगों की सादगी भरी छटा—यह दृश्य मन को आध्यात्मिक आनंद से भर देता है। यह परंपरा बताती है कि होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि हृदयों के मिलन का भी पर्व है।
होली की उपाधियां: मीठा व्यंग और मधुर संवाद
होली से जुड़ी एक और रोचक परंपरा थी—नगर के प्रमुख व्यक्तियों को हास्यपूर्ण उपाधियां देना। व्यक्ति के व्यक्तित्व, आदतों या कार्यशैली पर मीठा व्यंग करते हुए टाइटल बनाए जाते और कभी-कभी अखबारों में भी प्रकाशित होते।
राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएं और विभिन्न समूह अपने सदस्यों के लिए ऐसी उपाधियां तैयार करते। लोग इन्हें हंसी-खुशी पढ़ते और कई दिनों तक एक-दूसरे को छेड़ते रहते।
मुझे स्मरण है कि मैं स्वयं भी अभिभाषक परिषद के सदस्यों की उपाधियां तैयार करता था। उस समय लोगों में सहनशीलता और हास्य-बोध प्रचुर मात्रा में था। कोई भी इसे व्यक्तिगत आलोचना नहीं, बल्कि होली की मस्ती का हिस्सा मानता था।
आज के डिजिटल युग में जहां संवाद तेज है, वहां संवेदनशीलता भी बढ़ी है और सहनशीलता कहीं न कहीं कम हुई है। ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ पर आक्रामकता हावी होती दिखती है। फिर भी मेरा नगर के सुधि नागरिकों और बुद्धिजीवियों से विनम्र आग्रह है कि इस आत्मीय और स्वस्थ परंपरा को पुनः प्रारंभ करने का प्रयास करें।
त्योहारों की आत्मा उनकी परंपराओं में बसती है। यदि हम परंपराओं को समयानुकूल स्वरूप देकर आगे बढ़ाएं, तो वे कभी लुप्त नहीं होंगी।
आइए, इस होली पर केवल रंगों से नहीं, बल्कि सहनशीलता, हास्य, आत्मीयता और सामूहिकता से भी अपने नगर और अपने संबंधों को रंगें।
बुरा न मानो… होली है!
— क


