भवानीमंडी | (जगदीश पोरवाल)
ग्रामीण अंचल में संवेदनाओं और जागरूकता की नई मिसाल सामने आई है। घटोद गांव की दौलतबाई ने जीवनकाल में नेत्रदान का जो संकल्प लिया था, उसे उनके पुत्रों ने मृत्यु के बाद पूरा कर पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया। गांव के इतिहास में यह पहला नेत्रदान रहा।
मां की अंतिम इच्छा को दिया सम्मान
घटोद निवासी स्वर्गीय जगदीश गुप्ता की धर्मपत्नी दौलतबाई ने पहले ही नेत्रदान का संकल्प ले रखा था। उन्होंने परिवार को स्पष्ट रूप से अपनी इच्छा बता दी थी कि मृत्यु के बाद उनकी आंखें किसी जरूरतमंद को दान कर दी जाएं। निधन के बाद पुत्र जयप्रकाश और संजय ने बिना देर किए संस्था से संपर्क कर मां की अंतिम इच्छा को सर्वोपरि रखा।
अंतिम संस्कार का समय बदला, संकल्प नहीं
परिवार ने पहले अंतिम संस्कार का समय दोपहर 12:30 बजे घोषित किया था। लेकिन दरा क्षेत्र में जाम लगने से नेत्रदान टीम को पहुंचने में देरी हुई। ऐसे में परिवार ने अंतिम संस्कार का समय बदलकर दोपहर 2 बजे कर दिया, ताकि नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी हो सके।
गांव में पहली बार हुई नेत्रदान प्रक्रिया
भारत विकास परिषद एवं शाइन इंडिया फाउंडेशन की टीम के साथ नेत्र उत्सारक डॉ. कुलवंत गौड़ ‘ज्योति-रथ’ से घटोद पहुंचे। ग्रामीणों और परिजनों की उपस्थिति में कॉर्निया प्राप्त करने की प्रक्रिया संपन्न की गई।
गांव में यह पहला अवसर था जब नेत्रदान हुआ। बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे और पूरी प्रक्रिया को समझा।
दो नेत्रहीनों को मिलेगी रोशनी
डॉ. कुलवंत गौड़ ने बताया कि दौलतबाई का कॉर्निया सुरक्षित एवं स्वस्थ पाया गया है। इसे आई बैंक जयपुर भेजा गया है, जहां यह दो नेत्रहीनों को नई दृष्टि देगा।
सम्मान और प्रेरणा
नेत्रदान के पश्चात संस्था द्वारा परिवार को नेत्रदान गौरव पट्टिका एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। इस अवसर पर उपस्थित कई ग्रामीणों ने भी भविष्य में नेत्रदान का संकल्प लेने की इच्छा जताई।
परिवार का भावुक संदेश
पुत्र जयप्रकाश गुप्ता ने कहा, “मां ने जीवन में कई बार नेत्रदान की इच्छा जताई थी। हम चाहते थे कि उनकी अंतिम इच्छा अधूरी न रहे।”
नेत्रदान प्रक्रिया में मुरली गुप्ता (पाटन), मोहनलाल (खिलचीपुर), संजय (भवानीमंडी), हरिओम (रामगढ़) एवं महावीर (सुकेत) सहित परिवारजनों ने सहयोग किया।
ग्रामीण अंचल में बढ़ रही जागरूकता
नेत्रदान संयोजक कमलेश गुप्ता दलाल के अनुसार घटोद से यह पहला नेत्रदान है। इससे पूर्व सुनेल, मिश्रौली, डग, चोमेला, कड़ोदिया, बोलिया, सिंहपुर और हेमड़ा से भी नेत्रदान हो चुके हैं। अधिकांश मामलों में परिवारों ने स्वयं पहल कर प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है।
एक मां चली गई… लेकिन अपनी आंखों से दो जिंदगियों में उजाला छोड़ गई। घटोद के लिए यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि संवेदनाओं की नई शुरुआत है।

