राजयोग और धनयोग में उलझे नेता, भूल गए तन का योग!फोटो खिंचवाने तक ही सीमित नहीं रहे योग दिवस


योगा को जीवन शैली में नियमित शामिल करें ।

जगदीश पोरवाल

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर आज का कार्टून राजनीति और समाज की वर्तमान सोच पर गहरा कटाक्ष करता है। कार्टून में एक नेता मुस्कुराते हुए यह कहते दिखाई देते हैं कि उन्हें केवल दो ही योग पसंद हैं—राजयोग और धनयोग। यह संवाद भले ही हास्य पैदा करता हो, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश बेहद गंभीर है।

कार्टून यह दर्शाता है कि सत्ता की राजनीति में सक्रिय अधिकांश लोग राजयोग और धनयोग की प्राप्ति को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं। एक बार राजयोग मिल जाए तो उसे बनाए रखने की चिंता और धनयोग मिल जाए तो उसे बढ़ाने की दौड़ शुरू हो जाती है। इस निरंतर भागदौड़ में व्यक्ति उस वास्तविक योग को भूल जाता है, जो उसके शरीर, मन और स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक है।

धन और सत्ता से मन को संतुष्टि मिल सकती है

अशोक के कार्टून में संकेत है कि राजयोग पद और प्रतिष्ठा दे सकता है तथा धनयोग भौतिक सुख-सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है, लेकिन इनमें से कोई भी व्यक्ति को स्वस्थ शरीर नहीं दे सकता। धन और सत्ता से मन को संतुष्टि मिल सकती है, परंतु बढ़ती उम्र में वही व्यक्ति महसूस करता है कि नियमित योग, व्यायाम और अनुशासित जीवनशैली ही असली पूंजी थी।

योग दिवस पर फोटो खिंचवाना ही अपनी जिम्मेदारी नहीं माने

कार्टून के बहाने योग दिवस के आयोजन की औपचारिकता पर भी प्रश्न खड़ा किया गया है। आज अनेक संस्थान, विभाग और संगठन 21 जून को बड़े उत्साह से योग दिवस मनाते हैं, सामूहिक योग कार्यक्रम आयोजित करते हैं और फोटो खिंचवाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं। इससे सरकारी और संस्थागत खानापूर्ति तो हो सकती है, लेकिन शरीर की पूर्ति नहीं होती।

योग की वास्तविक सार्थकता , योगा को अपनी जीवन शैली का हिस्सा बनाएं

योग दिवस की वास्तविक सार्थकता तभी है जब इसे केवल एक दिन का उत्सव न मानकर जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए। वर्ष में एक दिन योग करने से स्वास्थ्य नहीं सुधरता। योग दिवस को एक शुरुआत मानते हुए पूरे वर्ष नियमित योग, प्राणायाम और स्वास्थ्य जागरूकता को अपनाना आवश्यक है। बीच-बीच में सामूहिक अभ्यास, प्रशिक्षण और पुनरावृत्ति कार्यक्रम आयोजित हों, ताकि योग केवल मंचों और भाषणों तक सीमित न रहकर जन-जन की दिनचर्या का हिस्सा बन सके।

कार्टूनिस्ट अशोक का यह व्यंग्य केवल नेताओं पर ही नहीं, बल्कि उन सभी लोगों पर लागू होता है जो धन, पद और व्यस्तता के नाम पर अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा कर रहे हैं। संदेश स्पष्ट है—राजयोग और धनयोग जीवन को सुविधाएं दे सकते हैं, लेकिन निरोगी जीवन का आधार केवल योग ही है। योग दिवस तभी सफल माना जाएगा जब उसका प्रभाव 21 जून तक सीमित न रहकर पूरे 365 दिनों तक दिखाई दे।

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