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जगदीश पोरवाल ( जन संदेश )
देश में पेपर लीक का मुद्दा गरमाया हुआ है, और अब इस पर सियासत की नई ‘कोचिंग’ शुरू होने जा रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी आगामी 17 जून को देश के सबसे बड़े कोचिंग हब कोटा से अपने देशव्यापी आंदोलन और छात्र संवाद की शुरुआत करने जा रहे हैं। एक तरफ जहां छात्र परीक्षाओं में धांधली से परेशान हैं, वहीं दूसरी तरफ इस गंभीर और संवेदनशील मामले में अब भारी राजनीतिक तड़का लगने को तैयार है।
कार्टूनिस्ट अशोक ने आज के अपने व्यंग्यात्मक कार्टून में इसी कड़वी हकीकत पर तीखा कटाक्ष किया है। कार्टून में साफ दिखाया गया है कि कोटा की कोचिंग में ‘NEET-JEE’ के बाद अब एक और नई शुरुआत होने जा रही है—’NETA’ (नेता) बनने की!
क्या सिर्फ छात्र हित या निशाना कहीं और है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी द्वारा इस आंदोलन की शुरुआत के लिए कोटा को चुनना महज एक संयोग नहीं है। कोटा दरअसल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का संसदीय क्षेत्र है। ऐसे में सीधे उनके गढ़ में जाकर युवाओं की नब्ज टटोलना और केंद्र सरकार को घेरना, कांग्रेस की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
लेकिन इस आंदोलन को लेकर कुछ गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। जानकार और बुद्धिजीवी वर्ग इस बात से आशंकित हैं कि क्या इस आंदोलन के पीछे की मंशा सिर्फ छात्रों को न्याय दिलाना है, या फिर पड़ोसी देशों में हाल ही में हुए ‘जेन-जी’ (Gen-Z) के उन आंदोलनों की तर्ज पर कोई बिसात बिछाई जा रही है, जिन्होंने वहां तख्तापलट कर दिया था?
छात्रों के भविष्य में ‘राजनीति का घोल’ कितना जायज?
पेपर लीक का मामला बेहद संवेदनशील और गंभीर है। लाखों युवाओं का भविष्य और उनकी सालों की मेहनत दांव पर लगी है। इस व्यवस्था को सुधारने के लिए सख्त से सख्त कदम उठाए जाने चाहिए और सरकार का पूरा ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि आखिर ये लीक हो कैसे रहे हैं।
लेकिन, छात्रों के इस जायज गुस्से और उनके भविष्य में राजनीति का यह गहरा घोल कितना सही है? इतिहास गवाह है कि जब-जब छात्रों के आंदोलन में विशुद्ध राजनीति हावी हुई है, तब-तब समाधान कम और सियासी रोटियां ज्यादा सेकी गई हैं।
अब देखना यह होगा कि 17 जून को कोटा की धरती से शुरू होने वाला यह ‘संवाद’ छात्रों के भविष्य को कोई नई दिशा देता है, या फिर यह शिक्षा की नगरी को केवल ‘नेतागिरी’ के एक नए अखाड़े में तब्दील करके छोड़ देता है।

