अजब राजस्थान की गजब सियासत: जब ‘सत्ताधारी’ ही बन बैठे ‘विपक्ष’, मुख्य विपक्ष ने ताना ‘योगनिद्रा’ का आसन!



जगदीश पोरवाल

राजस्थान की राजनीति में इन दिनों ‘मैनेजमेंट’ की ऐसी अद्भुत और अलौकिक बयार बह रही है, जिसे देखकर बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के सिर चकरा गए हैं। अमूमन माना जाता है कि सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरना, पुलिस की लाठियां खाना और नारे लगाना विपक्ष का (यानी कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई का) परम कर्तव्य है। लेकिन राजस्थान में ‘आउटसोर्सिंग’ का ऐसा बेहतरीन उदाहरण देखने को मिल रहा है, जहाँ विपक्ष का यह भारी-भरकम काम भी सत्ताधारी भाजपा का अपना ही अनुषंगी संगठन—अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद—पूरी निष्ठा के साथ ‘फ्री-लांसिंग’ पर कर रहा है!
हाल ही में राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव बहाली और फीस वृद्धि जैसे मुद्दों को लेकर जो हाई-वोल्टेज ड्रामा हुआ, उसने राजनीति के स्थापित सिद्धांतों को ही बदल कर रख दिया।

‘घर की बात’ जब पहुंच गई थाने तक
विश्वविद्यालय परिसर में एबीवीपी के छात्र अपनी ही सरकार की पुलिस से ऐसे भिड़ रहे थे, जैसे वे भूल गए हों कि जयपुर के सचिवालय में उनकी अपनी ही विचारधारा की सरकार बैठी है। पुलिस ने भी ‘अतिथि देवो भव:’ की परंपरा को किनारे रखकर अपने ही ‘भ्राता संगठन’ के कार्यकर्ताओं पर ऐसा लाठीचार्ज और धक्का-मुक्की की, जिसे देखकर खुद कार्टूनिस्ट अशोक को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि राज्य में ‘फेलियर मैनेजमेंट’ का यह लाइव थियेटर चल रहा है।
कार्टून में दो नेताओं की जो बातचीत दिखाई गई है, वह आज के हालात पर सबसे सटीक तमाचा है:
नेता जी नंबर 1: “लगता है विपक्ष सक्रिय हो गया है!”
नेता जी नंबर 2 (हांफते हुए): “नहीं, हमारे छात्र संगठन ने ही विपक्ष की जिम्मेदारी संभाल ली है!”

एनएसयूआई का ‘परम शांति’ मॉडल
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे सराहनीय और अनुकरणीय भूमिका कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई की रही। कायदे से जिस काम के लिए उन्हें सड़कों पर होना चाहिए था, उसे एबीवीपी को करता देख एनएसयूआई के नेताओं ने शायद ‘वर्क फ्रॉम होम’ ले लिया है। उन्होंने सोचा होगा—“जब हमारे हिस्से का लाठीचार्ज और पुलिसिया नोकझोंक खुद एबीवीपी वाले भाई कर रहे हैं, तो हम धूप में अपनी त्वचा क्यों खराब करें?” इसे कहते हैं विपक्ष का असली ‘स्मार्ट वर्क’।
भाजपा का गजब मैनेजमेंट!
इस गजब के विरोधाभास पर जब कुछ ‘अति-उत्साही’ विश्लेषकों से बात की गई, तो उन्होंने इसके पीछे भी भाजपा का गहरा मैनेजमेंट ढूंढ निकाला:

आत्मनिर्भर विपक्ष: “यह भाजपा का ‘आत्मनिर्भर भारत’ मॉडल है। हम विपक्ष के भरोसे नहीं रहते। अपनी सरकार की आलोचना भी हम खुद ही करेंगे और लाठियां भी हमारे ही लोग खाएंगे।”
पुलिस का न्यूट्रल गियर: “पुलिस यह साबित करना चाहती है कि वह पूरी तरह निष्पक्ष है। वह यह नहीं देखती कि लाठी खाने वाला कांग्रेसी है या संघी, लाठी तो बस लाठी है!”

क्रेडिट किसको मिलेगा?
अब सबसे बड़ा संकट यह खड़ा हो गया है कि अगर कल को सरकार छात्रसंघ चुनाव बहाल कर देती है या फीस कम कर देती है, तो इसका क्रेडिट किसे जाएगा?
क्या सरकार अपनी ही पीठ थपथपाएगी कि ‘हमने अपने ही छात्रों की मांग मान ली’?
या फिर एबीवीपी यह कहेगी कि ‘हमने अपनी ही सरकार को झुका दिया’?
खैर, क्रेडिट किसी को भी मिले, लेकिन राजस्थान की जनता और यूनिवर्सिटी के छात्र इस ‘मैनेजमेंट के अभाव’ वाले अतरंगे ड्रामे का पूरा लुत्फ़ उठा रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष कब तक अपनी इस ‘अघोषित छुट्टी’ का आनंद उठाता है!

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