बाल विवाह:सिस्टम को ‘आशीर्वाद’ या बचपन को ‘श्राप ?


भवानीमंडी (जगदीश पोरवाल)। राजस्थान में बाल विवाह की कुप्रथा किस कदर हावी है, इसे प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक ने अपनी कूची से बेनकाब किया है। उनकी यह कलाकृति हाल ही में जारी उन सरकारी आंकड़ों की गूँज है, जो राजस्थान को बाल विवाह के मामले में राष्ट्रीय औसत से ऊपर खड़ा करते हैं।

कार्टून का तीखा कटाक्ष: ‘साहब’ का दोहरा चेहरा

अशोक के कार्टून में दिखाया गया है कि एक जागरूक व्यक्ति बाल विवाह रुकवाने के लिए जब दफ्तर का दरवाजा खटखटाता है, तो उसे पता चलता है कि जिस ‘साहब’ पर कानून बचाने का जिम्मा है, वे खुद ‘नेताजी’ के साथ एक बाल विवाह समारोह में आशीर्वाद देने गए हैं। यह व्यंग्य प्रशासन के उस दोहरे मापदंड को दर्शाता है, जहाँ फाइलों में तो सख्ती है, लेकिन ज़मीन पर कुरीतियों को रसूखदारों का ‘आशीर्वाद’ प्राप्त है।
आंकड़ों का आईना: राजस्थान में ‘बचपन’ की डरावनी तस्वीर

ताजा रिपोर्ट के ये आंकड़े बताते हैं कि आखिर क्यों अशोक का यह कार्टून आज के समय की सबसे कड़वी सच्चाई है:
राष्ट्रीय औसत से आगे प्रदेश: जहाँ देश में बाल विवाह की औसत दर 23.3% है, वहीं राजस्थान में यह आंकड़ा 25.4% के पार है।
ग्रामीण भारत की बेड़ियाँ: ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की दर 28.3% है, जो शहरी क्षेत्रों (15.1%) के मुकाबले लगभग दोगुनी है।

इन जिलों में स्थिति सबसे गंभीर:

चित्तौड़गढ़: 42.6% (सबसे अधिक प्रभावित)
भीलवाड़ा: 41.8%
झालावाड़: 37.8%
कोटा/गंगानगर: 13% से अधिक

दिखावे की सख्ती और कड़वा सच
रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2022 से 2024 के बीच 1196 शादियाँ रोकी गईं और हाल ही में 19 अप्रैल 2026 को एक ही दिन में एक दर्जन से अधिक शादियाँ रुकवाई गईं। लेकिन, कार्टूनिस्ट अशोक का व्यंग्य यह सवाल पूछता है कि हजारों रोकी गई शादियों के बीच उन लाखों शादियों का क्या, जिन्हें रोकने वाले अधिकारी खुद ‘आशीर्वाद’ देने पहुँच जाते हैं?

सिस्टम की सख्ती कागजो में नहीं फील्ड में होनी चाहिए

जब तक झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ जैसे जिलों में 40% से अधिक बचपन मंडपों में जलता रहेगा और सिस्टम ‘नेताजी’ के दौरों में व्यस्त रहेगा, तब तक ये आंकड़े और कार्टून समाज को यूँ ही झकझोरते रहेंगे। कानून का डर तब तक पैदा नहीं होगा, जब तक आशीर्वाद देने वाले हाथ सलाखों के पीछे नहीं होंगे।

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