युद्ध विराम से बढ़ी ‘मुनाफाखोरों’ की धड़कनें, क्या अब भी महंगाई का ‘ईंधन’ जलता रहेगा?

​भवानीमंडी ( जगदीश पोरवाल ): मिडिल ईस्ट के रणक्षेत्र से जैसे ही ‘दो सप्ताह के युद्ध विराम’ की खबर आई, पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली। लेकिन, हमारे गली-मोहल्लों के उन “अवसरवादी अर्थशास्त्रियों” के माथे पर पसीना आ गया है, जिन्होंने युद्ध की एक चिंगारी सुलझते ही अपनी दुकानों के सामानों की कीमतों में आग लगा दी थी।

​प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अशोक श्रीमाल के ताज़ा कार्टून ने आम आदमी के इसी ज्वलंत सवाल को हवा दी है। कार्टून में एक चिंतित नागरिक साफ़ तौर पर पूछ रहा है— “क्या युद्ध विराम के साथ उन चीज़ों के दाम भी विराम लेंगे, जिन्हें युद्ध का बहाना बनाकर आसमान पर पहुँचा दिया गया था?”

मुख्य हाइलाइट्स:

  • बहानेबाजी का ‘ग्लोबल’ मॉडल: जनता का मानना है कि जब खाड़ी देशों में पत्ता भी हिलता है, तो यहाँ के बाज़ारों में दाल, तेल और पेट्रोल के दाम “रॉकेट” बन जाते हैं। अब जब वहाँ शांति की बात हो रही है, तो क्या ये कीमतें वापस ज़मीन पर उतरने का कष्ट करेंगी?
  • महंगाई का ग्राफ: कार्टून में हाथ में थामे ‘महंगाई’ के बढ़ते ग्राफ वाला चार्ट चीख-चीख कर कह रहा है कि युद्ध तो बॉर्डर पर होता है, लेकिन उसकी आड़ में असली “सर्जिकल स्ट्राइक” आम आदमी की जेब पर की जाती है।
  • जनता का यक्ष प्रश्न: क्या दुकानदार और कंपनियां इस ‘शांति काल’ का फायदा उपभोक्ताओं को देंगी, या फिर “सप्लाई चेन की खराबी” का नया बहाना ढूंढ लिया जाएगा?

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