दया की रोशनी से बुजुर्ग पन्नालाल की जिंदगी में लौटी रोशनी

द

​आगे-पीछे कोई नहीं, गांव के लोगों ने दिखाई इंसानियत; फलोदी नेत्रालय में 15 मिनट के अंतराल में दोनों आंखों का सफल ऑपरेशन

​भवानीमंडी। (जगदीश पोरवाल)

आज के दौर में जहां अपने ही अपनों से दूरी बनाने लगे हैं, वहीं इंसानियत और दया की भावना आज भी समाज में जिंदा है। इसका जीवंत उदाहरण समीपवर्ती मध्यप्रदेश के बाबुल्दा गांव में देखने को मिला, जहां एक निराश्रित बुजुर्ग की आंखों की रोशनी गांव के लोगों की संवेदनशीलता और चिकित्सक की मानवीय पहल से लौट आई।

​बाबुल्दा निवासी बुजुर्ग पन्नालाल के आगे-पीछे कोई नहीं है। गांव के लोग ही उसकी जरूरतों का ध्यान रखते हैं। उम्र बढ़ने के साथ दोनों आंखों में मोतियाबिंद बढ़ता गया और धीरे-धीरे उसकी आंखों की रोशनी इतनी कम हो गई कि उसे दिखाई देना लगभग बंद हो गया। ऐसे में गांव के कुछ लोगों ने उसकी तकलीफ को महसूस किया और 3 अक्टूबर को उसे भवानीमंडी स्थित फलोदी नेत्रालय लेकर पहुंचे।

​जांच के बाद नेत्रालय के चिकित्सक डॉ. निलेश गुप्ता ने बताया कि दोनों आंखों का मोतियाबिंद पूरी तरह पक चुका है और ऑपरेशन करना आवश्यक है। सामान्य परिस्थितियों में दोनों आंखों का ऑपरेशन एक साथ नहीं किया जाता, लेकिन पन्नालाल की स्थिति अलग थी। उसके साथ देखभाल करने वाला कोई परिजन नहीं था। ऐसे में साथ आए पाटीदार समाज के ग्रामीणों ने डॉक्टर को दोनों आंखों का ऑपरेशन करने की सहमति दे दी।

​15 मिनट के अंतराल में दोनों आंखों का ऑपरेशन

​डॉ. निलेश गुप्ता ने बताया कि बुजुर्ग की परिस्थिति को देखते हुए मामूली शुल्क पर 15 मिनट के अंतराल में दोनों आंखों का सफल ऑपरेशन किया गया। 5 अक्टूबर को जब दोनों आंखों की पट्टियां खोली गईं तो पन्नालाल के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी। अब उसे दोनों आंखों से साफ और स्पष्ट दिखाई देने लगा।

​डॉ. गुप्ता ने बताया कि सामान्य तौर पर दोनों आंखों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन एक साथ नहीं किया जाता, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में मरीज की स्थिति और उसके साथ उपलब्ध देखभाल की व्यवस्था को देखते हुए चिकित्सकीय निर्णय लिया जा सकता है।

​गांव वालों ने कहा—‘पन्नालाल हमारा अपना है’

​पन्नालाल को लेकर आए ग्रामीणों ने बताया कि उसके आगे-पीछे कोई नहीं है। गांव के लोग ही उसकी देखभाल और जरूरतों की व्यवस्था करते हैं। जब उन्हें पता चला कि उसकी आंखों की रोशनी लगभग चली गई है तो उन्हें उस पर दया आई। वे उसे लेकर भवानीमंडी आए और यहां सफलतापूर्वक दोनों आंखों का ऑपरेशन कराया।

​पन्नालाल के लिए यह केवल आंखों का ऑपरेशन नहीं, बल्कि अंधेरे से उजाले की ओर लौटने का सफर है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह संदेश भी दिया कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि संवेदना और इंसानियत से भी बनते हैं। गांव के इन लोगों ने साबित कर दिया कि किसी असहाय के जीवन में रोशनी लाने के लिए अपनेपन का रिश्ता होना जरूरी नहीं, सिर्फ एक संवेदनशील दिल होना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!