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शामगढ़/चौमहला: ( संजय जैन )
धर्मनगरी शामगढ़ की पुण्यधरा पर जिनशासन की आराधना और प्रभावना में अपना जीवन समर्पित करने वाले धर्मनिष्ठ श्रावक, स्वर्गीय श्री झमक लालजी मोगरा के सुपुत्र एवं सुश्रावक श्री माणकचन्द जी मोगरा (खजूरी पंत वाले) ने तप, संयम और वैराग्य की उत्कृष्ट साधना करते हुए अपने जीवन की अंतिम यात्रा संथारा आराधना के साथ पूर्ण की।
श्री माणकचन्द जी मोगरा ने 5 सितंबर (शनिवार) को रात्रि 7:30 बजे अपनी स्वेच्छा एवं परिवार की सहमति से चौविहार संथारा ग्रहण किया था। चौमहला के सुश्रावक श्री शरद जी नौलखा द्वारा उन्हें यह संथारा सजगतापूर्वक पचखाया गया था।
7 दिनों की गहन तपस्या और आत्म-साधना के पश्चात, 11 सितंबर (शुक्रवार) को दोपहर लगभग 12:15 बजे उनका चौविहार संथारा पूर्ण (सीज) हो गया। संथारा सीझने के समाचार मिलते ही संपूर्ण जैन समाज में धर्म-प्रभावना की लहर फैल गई।
भव्य डोल यात्रा एवं अंतिम संस्कार
शुक्रवार शाम 5:00 बजे शामगढ़ में उनकी भव्य डोल यात्रा निकाली गई, जो नगर के प्रमुख मार्गों से होती हुई शामगढ़ मुक्तिधाम पहुंची। रास्ते भर समाजजनों ने जयकारों के साथ उनकी तपोनिष्ठ आत्मा की अनुमोदना की। मुक्तिधाम में परिवार के सदस्यों द्वारा उन्हें मुखाग्नि दी गई।
परिवार एवं संबंध
श्री माणकचन्द जी मोगरा, रतलाम के पूर्व SDOP श्री प्रेमचंद जी मोगरा के बड़े भाई तथा मुकेश, राजू, गौतम, प्रीतम एवं मनोज मोगरा के पूज्य पिता श्री थे। आप चौमहला के नौलखा परिवार के जमाई थे।
ऐसी तपोनिष्ठ, संयमी एवं वैराग्यवान आत्मा की पावन आराधना पर संपूर्ण जैन समाज कोटि-कोटि अनुमोदना एवं भावपूर्ण वंदन व्यक्त करता है।


