लगभग 2,600 यात्रियों की क्षमता वाली यह ट्रेन उत्तर रेलवे के जिंद-सोनीपत खंड पर चलेगी
जगदीश पोरवाल
भारतीय रेलवे देश की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेन को हरी झंडी दिखाने के लिए तैयार है। यह ट्रेन सबसे स्वच्छ ईंधन हाइड्रोजन का उपयोग करके स्वयं बिजली उत्पन्न करती है और उपयोग के समय इससे लगभग शून्य उत्सर्जन होता है।
पश्चिम मध्य रेल, कोटा के वरिष्ठ वाणिज्य मंडल महाप्रबंधक सौरभ जैन ने बताया की यह उपलब्धि कोयले और भाप से स्वच्छ, टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों की ओर भारत की व्यापक यात्रा का एक नया अध्याय है।
हाइड्रोजन यात्री ट्रेन 10 कोच वाली होगी
पारंपरिक इलेक्ट्रिक ट्रेनों के विपरीत जो ओवरहेड लाइनों से बिजली लेती हैं, यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल ट्रेनसेट हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया के माध्यम से ट्रेन के भीतर ही बिजली उत्पन्न करती है, जिसमें जल वाष्प एकमात्र उप-उत्पाद के रूप में निकलता है। दुनिया भर में चलने वाली अधिकांश हाइड्रोजन यात्री ट्रेनों में केवल दो-तीन कोच होते हैं, जबकि भारतीय रेलवे की यह ट्रेन 10 कोच वाली यात्री ट्रेन के रूप में तैयार की गई है — दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कार और आठ ट्रेलर कोच। प्रत्येक पावर कार 1,200 किलोवाट बिजली उत्पन्न करती है, जिससे ट्रेन 110 किमी/घंटा की डिज़ाइन गति तक पहुंच सकती है। यह जिंद जंक्शन, गोहाना जंक्शन और सोनीपत सहित 89 किमी के मार्ग पर 75 किमी/घंटा की परिचालन गति से चलेगी।
भारत की सबसे बड़ी हाइड्रोजन भंडारण की सुविधा हरियाणा में
हरियाणा के जिंद में भारत की सबसे बड़ी रेलवे हाइड्रोजन ईंधन भरने की सुविधा भी स्थापित की है, जहां विद्युत अपघटन से ग्रीन हाइड्रोजन तैयार कर उसे 500 बार तक संपीड़ित और 350 बार पर वितरित किया जाता है। यह सुविधा एक बार में लगभग 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन का भंडारण कर सकती है और पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) से अनुमोदित है।
सुरक्षा को लेकर पूरी सतर्कता बरती गई
सुरक्षा को लेकर रेलवे ने बताया कि ट्रेन और संयंत्र, दोनों में हाइड्रोजन रिसाव, असामान्य गर्मी, आग की लपटों और धुएं का पता लगाने वाले उपकरण लगातार निगरानी करते हैं। किसी भी असामान्य स्थिति में स्वचालित शट-ऑफ सिस्टम बिना मानवीय हस्तक्षेप के हाइड्रोजन आपूर्ति बंद कर सकता है, जबकि निरंतर वेंटिलेशन रिसी हुई हाइड्रोजन को तुरंत खुली हवा में फैला देता है। ट्रेन का डिज़ाइन एनएफपीए-2 और आईएसओ 19880 जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है, और चालू करने से पहले जर्मनी की टीयूवी एसयूडी ने इसका स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन किया है।
ट्रेन का डिजाइन पूरी तरह भारत में किया गया
ट्रेन का पूरी तरह से भारत में डिज़ाइन और एकीकरण किया गया है। रिसर्च डिज़ाइन एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन (आरडीएसओ) ने तकनीकी विशिष्टताएं तैयार कीं, मेसर्स मेधा सर्वो ड्राइव्स ने ट्रेनसेट का एकीकरण किया, जबकि इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) ने बाहरी डिज़ाइन में योगदान दिया।
रेलवे के अनुसार, दुनिया भर में हाइड्रोजन ट्रेनें अभी शुरुआती दौर में हैं — जर्मनी व्यावसायिक हाइड्रोजन यात्री ट्रेनें शुरू करने वाला पहला देश बना है, जबकि फ्रांस, इटली, चीन और जापान जैसे देश अभी प्रायोगिक स्तर पर काम कर रहे हैं। भविष्य में भारतीय रेलवे कालका-शिमला जैसे विरासत मार्गों पर भी हाइड्रोजन तकनीक के विस्तार की संभावनाएं तलाश रहा है, जो राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और देश के नेट जीरो लक्ष्य में योगदान देगा।

