भवानीमंडी। (जगदीश पोरवाल )
क्षेत्र में इस वर्ष मानसून की स्थिति गत वर्ष के मुकाबले बेहतर नजर आ रही है। 14 जुलाई तक की स्थिति पर नजर डालें तो पिछले साल की तुलना में इस बार करीब 1 इंच अधिक बारिश दर्ज की जा चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष अब तक 245 मिमी (करीब 10 इंच) बारिश हो चुकी है, जबकि गत वर्ष इसी अवधि तक 223 मिमी (करीब 9 इंच) बारिश हुई थी। जून माह के आखिर में हुई समय पर बुवाई के कारण फिलहाल खेतों में फसलें लहलहा रही हैं और स्थिति काफी अच्छी है।
नमी बचाने के लिए खेतों में चल रहे ‘करपे’
अच्छी बारिश के बाद अब किसान खेतों में ‘कल्पा’ (करपा) चलाने के काम में जुटे हुए हैं। किसानों का मानना है कि यदि खेतों में समय रहते दो बार करपे चल जाएं, तो मिट्टी में लगातार नमी बनी रहती है। इससे यदि आगामी दिनों में बारिश खिंच भी जाती है, तो फसल 10 से 15 दिन तक बिना पानी के आसानी से टिक सकती है। ग्राम भैसोदा के किसान जगदीश लखावत और गुराड़िया जोगा के किसान बद्रीलाल शर्मा ने बताया कि वर्तमान में फसलों की स्थिति बेहद संतोषजनक है और खेतों में तेजी से करपे चलाए जा रहे हैं।
बैल से लेकर ‘तीररी’ तक: बदला खेती का अंदाज
समय के साथ खेतों में करपे चलाने के साधन भी पूरी तरह बदल चुके हैं। कभी लंबे समय तक बैल जोड़ियों से यह काम होता था, जो अब लगभग दुर्लभ हो चुका है। बैलों के बाद ट्रैक्टर और फिर मोटरसाइकिल का दौर आया। किसान जगदीश लखावत और घनश्याम पाटीदार ने बताया कि पहले मोटरसाइकिल के पीछे करपा चलाने के लिए पांच मजदूरों की जरूरत होती थी, जिस पर करीब ₹2500 का खर्च आता था। लेकिन अब तकनीक और बदल गई है; अब मोटरसाइकिल के पीछे ‘तीररी’ (लिफ्ट सिस्टम) लगाकर बिना किसी मजदूर के अकेले ही यह काम निपटा लिया जाता है, जिससे लागत में भारी कमी आई है।
सियासत के शिखर पर, पर खेती में आज भी ‘परंपरा’ का साथ
जहाँ आज के दौर में बैल जोड़ी से खेती ढूंढने पर भी नहीं मिलती, वहीं ग्राम पगारिया के किसान और वरिष्ठ कांग्रेस नेता (भवानीमंडी ब्लॉक अध्यक्ष) रोडसिंह परमार का परिवार आज भी इस अनूठी परंपरा को जीवित रखे हुए है।
“हमारे गांव में लगभग सभी किसान ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल से करपे चला रहे हैं, लेकिन मेरा परिवार आज भी पारंपरिक बैल जोड़ी से ही यह कार्य करता है। पूरे क्षेत्र में अब हमारे अलावा सिर्फ एक और किसान के पास बैल जोड़ी बची है।”
— रोडसिंह परमार, किसान व ब्लॉक अध्यक्ष
बता दें कि श्री परमार का परिवार पगारिया गांव में बेहद रसूखदार है और उनकी चौथी पीढ़ी वर्तमान में वहां सरपंच है। इतने बड़े राजनीतिक और सामाजिक रसूख के बावजूद उनका मुख्य व्यवसाय आज भी खेती ही है। समय मिलते ही वे राजनीति की व्यस्तता छोड़ खेतों में उतर जाते हैं और खुद बढ़-चढ़कर किसानी के कार्यों में रुचि लेते हैं। तकनीक के इस आधुनिक युग में परमार परिवार का जमीन और परंपरा से जुड़ाव क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
फोटो – समय के साथ-साथ खेत में करपे चलाने के साधन भी बदले ।

